प्रार्थना भगवान और भक्त को जोड़ने वाला पुल – मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा.

रतलाम, 4 सितंबर। भगवान के पास जाकर प्रार्थना करना चाहिए लेकिन उसके साथ प्रभु के प्रति हमारी श्रद्धा होना चाहिए। श्रद्धा प्रभु के आगे झुकने से आती है। बिना श्रद्धा के कुछ नहीं होता है। प्रार्थना करते-करते भक्त का हदय परिवर्तित हो जाता हैं। यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा के शिष्य मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टॉकीज में प्रवचन के दौरान कहीं। मुनिराज ने कहा कि हमें घर की तीसरी मंजिल तक जाना हो या होटल में तब हम लिफ्ट का प्रयोग करते है, लेकिन प्रभु के द्वार पर जाने के लिए हजारों सीढ़ियां भी आसानी से चढ़ जाते है, यह प्रभु के प्रति हमारी श्रद्धा है, जो हमें वृद्धा अवस्था में भी ऊपर तक ले जाती है। मुनिराज ने विश्वास और श्रद्धा को परिभाषित करते हुए कहा कि बादल होने के बाद भी दिन में 12 बजे सूरज है यह हमारा विश्वास है। कैसी भी परिस्थिति रहेगी, मैं ठीक रहूंगा यह हमारी श्रद्धा है। पूर्ण दर्शन हमेशा विलाप कराता है लेकिन अपूर्ण दर्शन से कभी विलाप नहीं होता। दुनिया में कोई भी चीज अच्छी नहीं है और कोई भी चीज मेरी नहीं है, ऐसी हमारी सोच होना चाहिए। हमारा विजन एक्स-रे का होना चाहिए या कैमरे का यह हमें तय करना है। मुनिराज ने कहा कि सबसे पहले भगवान के पास जाना चाहिए और उनकी शरण में समर्पण भाव रखना चाहिए। प्रार्थना भगवान और भक्त को जोड़ने वाला पुल है। प्रार्थना में शब्द कम और भाव ज्यादा होते हैं। भक्त के जीवन में परिवर्तन आए इसके लिए प्रार्थना होती है। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।