पर्युषण महापर्व का पंचम दिवस

रतलाम । श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ नीमचौक पर पर्युषण महापर्व पर प्रवचनकार पूज्य गुरुदेव श्री अरुणमुनि जी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि चींटी से लेकर हाथी, मनुष्य से लेकर देवता सभी को सुख की कामना है । लेकिन सुख कँहा मिलेगा यह जानने से पहले यह जानना जरूरी है की सुख किसे कहते है, सुख क्या है।
सुख के विषय में सबके विचार अलग अलग है, प्रभु कहते है की संसार का प्रत्येक प्राणी सुख पाना चाहता है, अनादिकाल से सुख की खोज जारी है। हस्थ चाहता है वो सुखी रहे उसका परिवार सुखी रहे, राजा चाहता है की वो सुखी रहे उसकी प्रजा सुखी रहे।सुख के लिये व्यक्ति अपने घर में साधनों का अंबार लगाता है, पंखा, कूलर, एसी, वाहन, मशीन और न जाने क्या क्या, लेकिन ये भौतिक साधन जितने जितने बढ़ाओगे उतनी उतनी आकांक्षा बढ़ती जाएगी। इन जड़ पदार्थो से जो सुख प्राप्त होता है वो बाह्य सुख है।
यह इंद्रीजन्य सुख विषमिश्रित सुख होता है। स्वादिष्ट पदार्थ का सुख केवल जिव्हा को मिलता है, मधुर संगीत का सुख केवल कानों को मिलता है, खुशबू का सुख केवल नाक को मिलता है, वस्तुजन्य सुख केवल सुख का आभास है, ऐसा सुख थोड़ी देर के लिये अच्छा लगता है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम भयंकर होते है। गोबर के कीड़े को गोबर में ही सुख लगता है, चकोर के सामने आग और कपूर रख दो तो वो आग की तरफ ही भागता है।
भंवरा मजबूत से मजबूत लकड़ी में भी रास्ता बना लेता है लेकिन वही भंवरा कमल के फूल की और आकृष्ट होकर उसके भीतर कैद होकर रह जाता है, आसक्ति की वजह से वह उस पंखुड़ी को खोल नही पाता है, रात भर वह सोचता है की रात भर यँहा आराम करूँगा और सुबह बाहर निकलकर सबको इस सुख के बारे में बताऊँगा, लेकिन रात में हाथी अपनी मस्ती में आता है और उस पंखुड़ी और भंवरे को तहस नहस कर देता है ।
वैसी ही स्थिति मनुष्य की होती है वह दिन रात संसार में उलझा रहता है और पैसा पैसा करता रहता है, अपने शरीर का भी नाश कर लेता है, और सोचता है की थोड़ा और कमा लूँ फिर खूब आराम करूँगा, लेकिन ऐसा आराम उसे कभी मिलता ही नही है । भौतिक सुखों में व्यक्ति अपने जीवन को समाप्त कर रहा है, सुख अच्छे भोजन में नही है अच्छे पाचन में है। भौतिक सुख मृगतृष्णा के समान होता है ।
सुख तो स्वंय में है, पर में तो दुःख ही दुःख है। सच्चा सुख प्राप्त करना है जो अपने जीवन को अंतर्मुखी बनाना होगा और साधनों की अंधी दौड़ से अपने आप को दूर रखने का अभ्यास करना होगा, तभी सच्चे सुख की प्राप्ति सम्भव है।