
रतलाम, 25 सितंबर 2023। जीवन में संस्कार का बहुत महत्व होता है। हमें भी यह चेक करना चाहिए कि कहीं हमारे भीतर संस्कारों की कमी तो नहीं है। संस्कार से ही हमारी पहचान होती है। मानव जीवन की प्रवृत्ति होती है काम को टालने की लेकिन यदि कोई काम है तो उसे आज ही कर लेना चाहिए, किसी भी काम में लेट लतीफी खतरनाक होती है।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. के शिष्य मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाॅकीज में प्रवचन के दौरान कही। मुनिराज ने कहा कि जीवन में आप भले कुछ बनो या न बनो लेकिन समर्पणशील, संयमशील, सहनशील, स्नेहशील और संवेदनशील जरूर बनो। गुरू के प्रति समर्पण का भाव होना चाहिए। यदि आप संपन्न है तो साधु भगवंत के साथ दीक्षा लेने वाले नन्हे मुनियों को शिक्षा दिलाने का काम करें। जीव को अभयदान देने से भी कई गुना अधिक पुण्य इस कार्य में मिलता है। साधु जीवन में दीक्षा लेने के लिए उम्र की नहीं, गुण की आवश्यकता होती हैै।
मुनिराज ने कहा कि मनुष्य भव पाया है तो हमें यह भी तय करना होगा कि हमें जीवन में संयम चाहिए या फिर संयम में जीवन होना चाहिए। हमें अपने भीतर मन को टटोलना होगा और यह देखना होगा कि आखिरकार हमारे भीतर किस गुण की कमी है। यदि हमे तप करना है तो वह तब ही कर सकेंगे जब हम अपनी पांचों इंद्रियों पर नियंत्रण रख सकेंगे। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के तत्वावधान में चल रहे प्रवचन में श्री संघ के पदाधिकारियों के साथ बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रही।