णमो तुज्झ रविंदमुनिस्स, णमो तुज्झ णाण – दंसण – चरित्त – तवो |
भारतीय परम्परा की धरा पर धर्म के वास्तविक स्वरूप से अवगत कराने के लिए महानपुरूषों के अनुचिंतन-मनन से जनकल्याण हेतु नवीन प्रयोग सदियों से किये जा रहे है जिससे विश्व में शांतिकल्याण के उदघोष का विगुल बजे | महानपुरूष किसी जाति-सम्प्रदाय से बंधे नहीं होते वे निस्वार्थ भाव से स्व-परहितार्थ की भावना भाते हैं, उनके ऐसे साहस भरे कार्य को पूर्ण होते देखकर अनुपम व्यक्तित्त्व की इर्ष्या से अर्थात् उदासीन होकर स्वर्ग के देवता भी अपना शीश प्रशंसा में हिलाते है |1
हमें ज्ञात है कि सम्पूर्ण विश्व प्रभात में निकले स्वर्णिम सूर्य की किरणों से आलोकित होता है जिससे क्षण-मात्र भी अंधकार टिक नही पाता वो बात दूसरी है कि कोई मनुष्य अँधेरी कोठरी में बैठा हुआ हो तो उसे सूर्य से निकलने वाली प्रभावी किरणों का लाभ कैसे होगा? आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा में बताते है कि सुबह की धूप शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार करती है और शरीर निरोग रहता है अर्थात् सूर्यदेव से आरोग्य, आयु और ऐश्वर्य प्रदान करने हेतु भक्त उस सूर्य भगवान को नमस्कार करता है |2 हिन्दू धर्म में ही नहीं जैन धर्म में भी सूर्य हमारे ज्योतिष्क देव हैं सम्पूर्ण आकाश के जितने भी तारामंडल आदि है वे सब देवों की कैटेगिरी में आते हैं |3 वर्तमान समय में ऐसे देवपुरूष श्रमणसंघ के सरताज, उज्ज्वल नक्षत्र सूर्य रूपी रविदत्त से बने रविन्द्र मुनि जी महाराज साहब है जो अपनी सम्यक अनुचिंतन धारा से श्रमणसंघ के कल्याण हेतु भारंडपक्षी के समान सजग है |4 जिस प्रकार भारंड पक्षी के दो मुख होते है वो सोता हुआ, खाते-पीते हुए भी अपने शत्रुओं से सावधान रहता है उसी प्रकार बाबा प्रेमसुख फुलवारी के ज्येष्ठ शिष्य रत्न, सदगुणों की खान, यथार्थवादी और आदर्शवादी का समन्वय संचालक, विश्व विकास के हितचिन्तक मम गुरूवर श्री रविन्द्र मुनि जी महाराज है | इनका व्यक्तित्त्व इतना विशाल है जिसको दर्शाना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है फिर भी ना जाने अबोध बालक की भांति कुछ विचार गुरुदेव की 46 वीं दीक्षा दिवस के अवसर पर लिखने का साहस कर रही हूँ |
सर्वप्रथम महाकवि स्वंयभू द्वारा स्तुति के माध्यम से गुरू देव मेरे क्या है-
जय तुहुं गइ तुहुं मइ तुहुं सरणु |
तुहुं माय वप्पु तुहुं बंधु जणु ||5
हे गुरूदेव ! आपकी सदा ही जय हो ! आप मेर जीवन की गति को सुधारने वाले मेरी गति हो, आप मेरी बुद्धि को निर्मल बनाने वाले मेरी बुद्धि हो, आप मेरी हर प्रकार की विपदा से रक्षा करने वाले रक्षक हो | आप मेरे मात-पिता और बन्धुजन हो | जिस प्रकार माता – पिता अपने बच्चे का पालन – पोषण करते हुए उसे सुसंस्कारों से सुसज्जित करते हैं उसी प्रकार मेरे द्वारा आपकी गुरूधारणा 1995 नबम्बर माह में अंगीकार की गयी तब से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक आप पूरे परिवार अपितु श्रमण संघ के आप मात – पिता और बंधु हो क्योंकि आप के गुणों के फलस्वरूप आपको संघरत्न, संघसेतु, उपाध्याय पद से आचार्य भगवं श्री शिवमुनि जी द्वारा प्रदान किये गये |
धन्य धन्य भारतभूमि ! जहाँ आपका माता दुलारी की कुक्षी से आपका जन्म 6 मई 1960 को सदर बाजार गली जाटान ब्राह्मण कुल में हुआ और पिता शंकर शर्मा के लाल कहाए | आप छह भाइयों में सबसे छोटे और आपसे छोटी एक बहन है | आपका जन्म नाम रविदत्त रखा गया | बचपन से ही आप कौशल प्रतिभा के धनी है, सोने में सुहागा तब हुआ जब आपकी शिक्षा सदर बाज़ार के श्रमणोपासक स्कुल में हुई वहां आपको लौकिक शिक्षा के साथ-साथ जैन धर्म की पढ़ाई भी कराई जाती | कांचन मणी का संयोग जैसे माता-पिता के सुसंस्कारों और जिनधर्म के मूल सिद्धांतों से अवगत हुए स्वामी भागमल जी महाराज के स्वर्गारोहण की अंतिमयात्रा को देख वैराग्य हिलोरें मारने लगा |6 कहते है ना जब कुछ और जानना होता है संसार की असारता के विषय में तो कुछ न कुछ संयोग बन जाते है |
पिता शंकरशर्मा अपने दोस्त के साथ जैन मुनि के दर्शन हेतु जाया करते थे | सदर बाज़ार की जैन स्थानक में भागमल जी महाराज की सेवा में श्री प्रेमसुख जी महाराज विराजमान थे | वहां दोनों मित्रों ने महाराज को वंदन-नमन करके और सुख-साता पृच्छा करके आसन पर विराजमान होते हैं | अचानक श्री प्रेमसुख महाराज जी द्वारा परिवार में सभी सदस्यों विशेषकर संतान के विषय में पूछा कि लाला जी ! आपके कितने बच्चे हैं ? आपने सरलता से सभी के नाम बताये जैसे ही आपने छोटे बेटे का नाम रविदत्त बताया, वैसे ही तुरंत प्रेमसुख जी महाराज बोले बस रवि को मुझे दे दो | यह सूर्य की भांति चमकेगा और जिनशासन को दिपायेगा |7 संत वचन कभी खाली नही जाते | आज यह बात यथार्थ सिद्ध हो रही है | तभी लाला जी कहने लगे कि रवि क्या आप सभी को ले लो किन्तु उन्हें तो आप ही चाहिए थे | फक्कड़ संत, भोला चेहरा, सुंदर सुडौल शरीर, प्रेमसुख महाराज जी के जैसे ही आपने दर्शन किये और उनके निश्राय में आने के लिए दसवीं परीक्षा के इम्तहान के बाद आज्ञा मांगी | उनकी स्वीकृति के पश्चात अपनी परीक्षा पूर्ण करके गुरू चरणों में छह महीने वैरागी बनकर प्रतिक्रमण, दशवैकालिक सूत्र के चार अध्याय, 25 बोल आदि का अध्ययन के उपरांत दिल्ली के इन्द्रपुरी जैन स्थानक में 11 अक्टूबर 1978 दशहरे वाले दिन दीक्षा अंगीकार की | कितना शुभ दिवस दशहरे अर्थात् दसों को जीता8 जिसमे पांच इन्द्रियां, चार कषायें और एक मन पर विजय प्राप्त करते हुए आप रविदत्त से रविन्द्र मुनि बने |
रविदत्त –श्री प्रेमसुख जी महाराज की शरण में रवि को दिया गया |
रविन्द्र – जो अपनी इन्द्रियों के स्वामी बने ऐसे इंद्र जो सूर्य की तरह श्रमण संघ को दीपाने वाले
आपका प्रबल भाग्य बाबा श्री प्रेमसुख जी महाराज की बगिया को हरा-भरा कर दिया जिसमें आप दिव्य तीन रत्न गुरू भाई श्री रमणीक मुनि जी और श्री उपेन्द्र मुनि जी महाराज जी बाबा जी के शिष्य बने | आज वर्तमान में आपकी फुलवारी शिष्य के शिष्य उनके भी शिष्य-प्रशिष्य अद्धभुत प्रतिभा के धनी बनकर श्रमणसंघ को देदीप्यमान कर रहे हैं |
तुहुँ परम – पक्खु परमत्ति – हरु |
तुहुं सव्वहुं परहुं पराहिपरु दंसने ||9
हे गुरूदेव ! आप परमपक्ष अर्थात् तर्क के परम आधार हो | आपके चिन्तन और आगमों के अध्ययन के फलस्वरूप कोई भी मिथ्याचारी टिक नही सकता | आपके पास ऐसा ज्ञान का भंडार है जिससे आप हर व्यक्ति की समस्या का समाधान कर देते हो | आप दुर्मति को दूर करके सद्बुद्धि के बीजारोपण करते हो | आप सभी अन्यों से भिन्न परम आत्मा हो | हे गुरूदेव ! आत्मा तो सबकी ज्ञान-दर्शन आदि गुणों से सम्पन्न हैं किन्तु विभाव में आकर, कषायों की अग्नि से आवेशित होकर अकरणीय कार्य को कर रही है या अपने स्वरूप से वंचित है | आप ऐसे करुणानिधि हो जो मुझे आपकी शरणागत प्राप्त हुई |
तुहुँ दंसने णाने चरित्त थिउ |
तुहुँ सयल – सुरासुरेहिं णमिउ ||10
गुरूदेव आप नवकार मन्त्र के चौथे उपाध्याय पद से विभूषित है जो 25 गुणों से अलंकृत है जिन्हें स्व और पर मत का ज्ञान, केवली सरीखे है क्योंकि आप की दिव्य आभा भक्त जनों के दुःखों को क्षणभर में दूर कर देती है जो मनुष्य अपने धर्म-कर्म से च्युत हो जाये तो उसे प्रमाण पूर्वक, प्रेमभाव से ज्ञान-दर्शन-चारित्र में स्थिर कर देते हो, आप केवली नही अपितु केवली सरीखे हो | वर्तमान समय में आपके द्वारा युवा पीढ़ी को धर्म के प्रति रूचि उत्पन्न करने हेतु, समन्वय के सूत्रों द्वारा, विना नियम दिए ही नियम का पालन करते है क्योंकि आपने द्वारा किये गये वार्तालाप से केवल बड़े – वृद्ध ही नही अपितु स्त्री – पुरूष और यहाँ तक कि सभी उम्र के बच्चें भी हिचकिचाहट न रखते हुए भी अपनी समस्या को रख देते है और आप अपनी कौशल बुद्धि से सभी को संतुष्ट कर देते हो | आपके समक्ष दर्शन करने वाले दर्शनार्थियों की भीड़ होती है फिर भी आप सभी के खैर – खबर पूछ लेते है, आप अपने स्वास्थ्य की परवाह नही करते हुए भी सभी के लिए अच्छा समय निकालकर जागृत स्वप्नों को साकार अर्थात् श्रमणसंघ के विकास हेतु उन योजनाओं से अवगत कराते हो जिसके फलस्वरूप आने वाले नकरात्मक विचारधारा वाले मनुष्य का चिंतन सकरात्मक होता है | आपकी दूरदृष्टि प्रतिभा अद्धभुत है तभी आचार्य भगवं को आपकी हर योजना पसंद आती है और उनके आज्ञा से कार्य में गतिविधियों का सिलसिला चलता रहता है और आगे भी चलता रहेगा |
सिद्धंते मन्ते तुहुँ वायरने |
सज्झाए झाने तुहुँ तवचरणे ||11
हे गुरूदेव ! आप सभी को जैन धर्म के सिद्धांतों से अवगत कराते है, आज कोई भी व्यक्ति ऐसा नही जो मानसिक, शारीरिक व्याधि से पीड़ित नही हो आपके द्वारा किसी को भी ऐसा मन्त्र नही दिया कि उससे दुःख दूर हो जाये अपितू आप कहते है कि श्रद्धा के द्वारा जपा गया नवकार मन्त्र से अशुभ समय शुभ में बदलता है और बिगड़े काम बन जाते हैं | आपकी वाचना शक्ति में जादू भरा हुआ है जिसमें आप कम से कम समय में भी सारयुक्त चित्रण कर देते है चाहे कोई भी विषय हो | जैनागम में बारह प्रकार के तप का वर्णन आता है उसमें से छह बाह्य और छह आभ्यंतर | जब तक आंतरिक तप में शुद्धि नही तो किये गये बाह्य तप व्यर्थ है | आप का सबसे अधिक रूचिकर तप स्वाध्याय12 है जिससे आप दिन भर जन-जन के बीच में व्यस्त रहते हुए, भी दो घड़ी का अध्ययन करते है उससे सारी थकावट रफूचक्कर हो जाती है | इसका स्वाद आप केवल नही चखते अपितु आने वालों को भी चस्का लगा देते हो | उनमें से एक मैं भी जिसे यह चस्का लग गया यह हमारी दवा है जिससे शारीरिक कष्ट और मानसिक कष्ट को छूने नही देता | जीवन के अंतिम क्षण तक इसका रस-पान करते हुए समाधि भाव पूर्वक मरण महोत्सव बने | आपका ध्यान, स्वाध्याय और तप की महिमा अपरम्पार है | स्वाध्याय में सब समा जाता है | यह एक विज्ञानिक गणित है जिसमें पुण्य बढ़ाते हुए जमा, व्यसन और 18 दोष को छोड़ते हुए घटा, क्षमादि दस प्रकार के धर्म करते हुए गुणा, अपने सद्कर्म में दान, शील, तप और भावना बढ़ाते हुए वर्गमूल प्रमाणिक रूप से फल साधक को होता है | आगम – वाचना का एक-एक शब्द का सरल शब्दों से उनके अर्थ तक ह्रदय तक पहुंचाना और उन्हें आजकी सामाजिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक, आर्थिक दृष्टिकोण के साथ संयोजन करना |
अरह्न्तु वुद्धू तुहुँ हरि हरु वि तुहुँ अन्नाण – तमोह – रिउ |
तुहुँ सुहुमु णिरंजणु परमपउ तुहुँ रवि वभ्भु सयम्भू सिउ ||13
हे गुरूदेव ! आप अरिहंत, बुद्ध, विष्णु और महादेव हो, आप अज्ञानरूपी अन्धकार के रिपु हो | आप सूक्ष्म, निरंजन और मोक्ष हो, आप सूर्य, ब्रह्मा, स्वयंभू और शिव हो |
अर्थात् आप तीर्थंकरों के कथित उपदेशों में वर्णित त्रिपदी सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए सृष्टि की रचना, पालन और विध्वंस का यथार्थ रूप दर्शाते हो, यह लोक किसी के द्वारा नही बनाया गया उत्पाद, व्यय और घौव्य के सिद्धांत अनुसार जन्म-मरण और आत्मा का अस्तित्त्व शाश्वत है संसारी जीव की अपेक्षा से प्रकट होती है और आप उस अन्धकार में डूबे हुए पथिक के लिए ज्ञान के आलोक से प्रकाशित करते है| तभी आपके दिव्य चिन्तन से श्रमणसंघ के साधू-साध्वी, वैरागी-वैरागनों, श्रावक-श्रविकाओं हेतु जूम-मीटिंग के माध्यम से ऑन लाइन शिक्षा की व्यवस्था की गयी है जिसके फलस्वरूप ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय आपके निमित्त से शिक्षार्थियों का हो रहा हैं| हे अन्वेषक शिरोमणी ! हे आत्मज्ञानी ! हे उपाध्याय प्रवर ! हे श्रमणसंघ के दिव्य रत्न ! चतुर्विध के संघसेतु ! आपको कोटिश: नमन |
हे ! समणसंघसम्माडझाणजोईसिरीसिवमुनि, समणसंघरयण – संघसेऊ – पेम्मसुहपरिवारसाण – भंतेसिरीपारसमुनिसीसो, भायररमणीयमुनिमाया, कनिट्ठउवेंदमुनिगुरुभाई, जोइसाचरियसिरीराजेसमुनि – सेवाहावीआलोएमुनि सीसा, लोयमन्नसिरीअनुवमसिस्सो य सव्वे –पोत्ता – पपोत्तासिस्सवग्गेहिं तुज्झ 46 वें दिक्खावसरे सुह्कामणा दामि |
हे ! श्रमणसंघ के सम्राट, ध्यानयोगी, श्री शिवमुनि, श्रमण संघ के रत्न, संघसेतु, प्रेमसुखपरिवार की शान, भंते श्री पारसमुनि के शिष्य, भ्राता रमणीक मुनि की माता, कनिष्ठ उपेन्द्र मुनि जी गुरू भाई, ज्योतिषाचार्य श्री राजेश मुनि, सेवाभावी आलोक मुनि जी शिष्य, लोकमान्य श्री अनुपम मुनि के शिष्य और सभी पोत्र – प्रपौत्र शिष्य वर्ग द्वारा आपको 46 वें दीक्षा अवसर पर शुभकामना देते है |
गुरूदिट्ठीए सेयं गुरुरविंदच्छाया कप्परुक्खोव्व |
गुरुवयणं भमहरणं सग्गसुहं गुरुपुच्छिदो हं ||
गुरू की दृष्टी में ही कल्याण है, गुरू रविन्द्र की छाया, कल्पवृक्ष के समान है | गुरू के वचन भ्रम को दूर करने वाले हैं | गुरू ने मुझे पूछा हैं, इसमें स्वर्गसुख है | अत: गुरुदेव आपके आशीर्वाद और मार्ग-दर्शन मुझे सदैव प्राप्त होता रहे| आपको पुन: पुन: दीक्षादिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं|
आपकी शिष्या
शोधार्थी रेनू जैन
1 तं किंपि साहसं साह्सेण साहंति, साहससहावा |
जं भाविऊण दिव्वो, परंमुहो धुणइ नियसीसं || वज्जालग्ग 1/1 पृष्ठ 2
2 नम: सूर्याय शांताय सर्व रोग विनाशिने |
आयुरारोग्यमैश्वासप्रश्वर्यदेहिदेव नमो अस्तुते || आ० ह्र०
3 जैन तत्व प्रकाश, पृष्ठ 80-
4 घोरा मुहुत्ता अबलं सरीरं |
भारंडपक्खी व चरे अपमत्ते || उत्तराध्ययन सूत्र, 4/6
5 स्तुति, महाकवि स्वयंभू, पृष्ठ 43
6 अरइं आउट्ठे से मेहावी खणन्सी मुक्के | आचारांग सूत्र, 1/2/2
7 चत्तारि सुत्ता – अतिजाते, अणुजाते,
अवजाते, कुलिंगाले || -स्थानांकसूत्र, 4/1
8 पंचिन्दियाणी कोहं, माणं मायं तहेव लोहं च |
दुज्जयं चेव अप्पाणं, सव्वं अप्पे जिए जियं || – उत्तराध्ययनसूत्र 9/36
9 स्तुति, महाकवि स्वयंभू, पृष्ठ 43
10 वही, पृष्ठ 43
11 स्तुति, महाकवि स्वयंभू, पृष्ठ 43
12 न वि अत्थि, न वि य होहि, न वि भविस्सइ सज्झाय समं तवो कम्मं | – वृह. आ. भा. 1169
13 स्तुति, महाकवि स्वयंभू, पृष्ठ 43