
रतलाम। व्यक्ति चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए लेकिन उसे एक बात का विचार अवश्य करना चाहिए कि मैं कौन हूं, मेरा क्या है और मैं किसका हूं। यह प्रश्न हमे अपनी अंतर आत्मा से पूछना चाहिए। हमारा रूप पल-पल बदलता है लेकिन अंदर का स्वरूप हमेशा एक सा होता है।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाॅकीज में प्रवचन में कहीं। आचार्य श्री ने कहा कि जब हम छोटे होते है तब माता-पिता के होते है, थोड़े बड़े होने पर पर दोस्तों के हो जाते है। ऐसे ही जीवन पल-पल बदलता रहता है। इस दुनिया में आत्मा और परमात्मा के सिवाएं आपका कोई नहीं है। जिस बेटे-बेटी को आप अपना मानते हो वह भी आपके नहीं है। आचार्य श्री ने कहा कि हमे अपना रूप सिर्फ बाहर से दिखाई देता है लेकिन भीतर में जो है, वह स्वरूप है। रूप परिवर्तनशील होता है, पल-पल में बदलता रहता है लेकिन स्वरूप अपरिवर्तनशील होता है। बचपन में अलग, जवानी में कुछ अलग और बुढ़ापे में कुछ और होता है लेकिन हमारा स्वरूप शुरू से एक सा ही रहता है। रूप नष्ट होने वाला है, स्वरूप कभी नष्ट नहीं होता वह अविनाशी है। रूप आंखों से दिखता है लेकिन स्वरूप को देखने के लिए ज्ञान चक्षु की आवश्यकता होती है।
श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।