रतलाम ,07 दिसम्बर | हम जिस संसार को दख रहे है यह दृश्य संसार है, दृश्य संसार से अदृश्य संसार बहुत बड़ा है। दृश्य संसार सिर्फ आंखों से दिखाई देता है। आंख हमारे शरीर की एक इन्द्रिय है मगर अन्य चार इन्द्रियों के संसार को हम देख नहीं सकते। उसका केवल भोग कर रहे है। अगर वह भोग आसक्ति के साथ होता है तो वह कर्म बंधन का कारण बन जाता है। यह बात बाजनखेड़ा से विहार करते हुए ग्राम मलवासा के बीच धर्म चर्चा करते हुए शांत क्रांति संघ के आचार्य श्री विजयराजजी महाराज ने कही | उन्होंने कहा कि संसारी लोग आसक्तिपूर्वक संसार के भोग में लगे रहते है। इसलिए वे संसार से मुक्त नहीं हो पाते। एक मात्र भोग ही बंधन है और भोग ही संसार परिभ्रमण का कारण है। भोग मुक्त आत्मा का मोक्ष होता है आचार्य श्री ने कहा कि संसार नहीं छोड़ सकते हो, तो सांसारिकता छोड़ देा। आसक्ति ही सांसारिकता है। जहां-जहां हमारी आसक्ति जुड़ती जाती है वहां हम बंधन में आ जाते है। शरीर आसक्ति का पहला स्थान है। माना शरीर सुन्दर है पर आत्मा न हो, तो शरीर का सारा सौंदर्य क्या काम का। शरीर आत्मा का वाहन है। यह वाहन सही रहे इसके लिए इसकी साज संभाल आवश्यक बन जाती है, लेकिन शरीर ही सब कुछ है, यह मानना मूल भरा और अज्ञान है। शरीर जितनी तेज गति वाला है उतना ही मंद गति वाला भी है। जितना सजग है उतना प्रमादी भी। इसलिए इस पर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता। जो शरीरजीवी होते है वे शरीर की आसक्ति में बंधे रहते है। इसे साधन, सुविधा और सुख प्रदान करते है मगर यह एक दिन धोखा देता है। आचार्य श्री ने कहा कि साधक शरीर को कोसता नहीं उसे कोसने की बजाय सुक्ष्म प्रज्ञा से उसे समझने की कोशिश करे। साथ ही इसे साधने की जरूरत है। साधक शरीर के वशवर्ती होकर नहीं उसे वशवर्ती रखकर जीते है। इसलिए साधकों के लिए शरीर समस्या नहीं बनता। साधक शरीर को साधन मानते है और और आत्मा को साध्य। साध्य आत्मा ही विशुद्ध बन कर परमात्मा बनती है।