रतलाम। जिनशासन गौरव आचार्य प्रवर पूज्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा. तथा मुनिमंडल एवं पुण्य पुंज साध्वी श्री पुण्यशीलाजी म. सा. व साध्वी मंडल के वर्षावास का पावन सानिध्य रत्नपुरी को प्राप्त हुआ है। डीपी परिसर लक्कड़पीठा पर प्रतिदिन धर्मसभा आयोजित हो रही है। जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन पधार रहे हैं। मंगलवार को हुए व्याख्यान में प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा. ने फरमाया कि जिस व्यक्ति को जीव – आत्मा पर दृढ़ श्रद्धा हो जाती है, वह अंतिम समय में भी धर्म का स्मरण करता है। धर्म पर जब गाढ़ी श्रद्धा हो जाती है, तब आत्मा संसार से विरक्त हो जाती है। हमें धर्म को समझकर उस मार्ग पर चलना है। मोह को खत्म करके धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ेंगे तो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होगा। श्री अतिशयमुनिजी म.सा. ने फरमाया कि जिनवाणी से जीव स्वयं का विकास कर सकता है। इसके बिना विकास संभव नहीं है। आत्मा के चार मूल गुण – क्षमा, सरलता, विनय और संतोष हैं। गुणों के विकास से आत्मा में ज्ञान की प्राप्ति होती है। प्रायः करके जीव ने दुर्गुणों को ही गुण मान लिया है। जिनवाणी के माध्यम से जीव पुरुषार्थ करता है। गृहस्थ जीवन में रहकर पुरुषार्थ करना बहुत कठिन है। इसीलिए संयम श्रेष्ठ है। श्रद्धा ऐसी हो कि मोहभंग हो जाए और स्वयं का विकास हो। संसारी जीव मोह बढ़ाने का प्रयास करता है या कम करने का? मोह भंग करने में ताकत होना चाहिए। सही बात को सही रूप में श्रद्धा करे तो अच्छा है।संसार एवं संसारियों की संगति की इच्छा हो तो मोक्ष दूर है। पाप क्रियाओं में लगा जीव धर्म से दूर रहता है। संसार से विरक्ति के लिए उसके स्वरूप को समझना होगा। जीवो की रक्षा की तो आत्मा की रक्षा होगी है। हिंसा से बचोगे तो अपने दुख से बचोगे , संसार घटेगा । आपको संसार जीतने की इच्छा होती है या नहीं? हम स्वयं के शरीर की सुरक्षा के लिए बहुत समय देते हैं लेकिन आत्मा के लिए समय नहीं देते। जीव ने शरीर को ही आत्मा मान लिया है। आत्मा की शुद्धि के लिए गुणों की आवश्यकता है। शरीर की सुरक्षा के पीछे आत्मा असुरक्षित है। शरीर है तो सुख-दुख लगे रहेंगे। जीव को शरीर क्यों मिलता है? जिसे जीव सुख का कारण मानता है, वही दुख का मूल कारण है। जिसके लिए वह दिन-रात एक कर देता है। किंतु वास्तविक सुख तो आत्मा के भीतर में ही है। जितना शरीर से राग घटेगा उतना आत्म-विशुद्धि का मार्ग सरल होगा । गुरु समर्पण वर्षावास समिति के मुख्य संयोजक शांतिलाल भंडारी, श्री धर्मदास जैन श्री संघ के अध्यक्ष रजनीकांत झामर व चातुर्मास समिति के सौरभ गादिया ने बताया कि प्रवर्तक श्री जिनेंद्रमुनिजी ने श्रावक -श्राविकाओ को ज्ञान दर्शन चारित्र व तप की विशिष्ट आराधना करने की प्रेरणा दी। मंगलवार को धर्मसभा में कल्याणपुरा, करवड़, नागदा, कुशलगढ़, सैलाना, पेटलावद आदि कई स्थानों के श्रावक श्राविकाएं उपस्थित थे। 24 जुलाई गुरुवार को श्री धर्मदास जैन श्री संघ द्वारा पक्खी पर्व जप – तप – त्याग – तपस्या के साथ मनाया जाएगा। श्रावक श्राविकाएं सामूहिक उपवास सहित विविध आराधना करेंगे। शाम को 7:15 बजे से पक्खी प्रतिक्रमण प्रारंभ होगा। श्री संघ ने पक्खी पर्व पर अधिक से अधिक आराधना करने का अनुरोध श्रावक -श्राविकाओं से किया है। संचालन अणु मित्र मंडल के मार्गदर्शक वीर भ्राता राजेश कोठारी ने किया। यहां पर बड़ी संख्या में तप आराधक तप आराधना कर रहे हैं। वही कई तपस्वी गुप्त तपस्या भी कर रहे हैं।