सेमिनार में वैज्ञानिकों और विद्वानों ने साझा किए शोध अनुभव




रतलाम 14 मार्च । उच्च शिक्षा में नवाचार और शोध संस्कृति को प्रभावी बनाने हेतु प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ़ एक्सीलेंस, शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, रतलाम में “अनुसंधान पद्धति: उच्च शिक्षा में नवाचार, चुनौतियाँ एवं भविष्य की संभावनाएँ” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतर विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र गरिमामय वातावरण में आयोजित हुआ। संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वानों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो.राजीव आर. ठाकुर ने अपने प्रेरक उद्बोधन में विद्यार्थियों को शोध और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया।
इस अवसर पर रतलाम में जन्मे वरिष्ठ अंतरिक्ष वैज्ञानिक प्रो. प्रहलाद चंद्र अग्रवाल ने मैसेज के माध्यम से अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उन्होंने वर्ष 1961 में इसी महाविद्यालय में बीएससी तक अध्ययन किया बाद में उनका चयन भाभा आण्विक अनुसंधान केंद्र मुंबई में हुआ। उन्होंने टीआईएफआर में कॉस्मिक रे एवं एक्स-रे खगोल विज्ञान पर शोध कार्य किया और मुंबई विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त की। बाद में उन्होंने कैलटेक (अमेरिका) में शोध कार्य किया। भारत लौटकर उन्होंने इसरो के सहयोग से एक्स-रे उपकरणों के विकास में योगदान दिया तथा भारत के पहले मल्टी वेवलेंथ स्पेस ऑब्जर्वेटरी एस्ट्रोसैट मिशन की योजना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विद्यार्थियों को विज्ञान के क्षेत्र में निरंतर जिज्ञासा, परिश्रम और नवाचार के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
संगोष्ठी में बीज व्याख्यान (की नोट एड्रेस) देते हुए प्रो. दीपक शर्मा (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) ने कहा कि शिक्षा और बुद्धिमत्ता अलग-अलग अवधारणाएँ हैं तथा नवोन्मेषी और आलोचनात्मक चिंतन ही वास्तविक ज्ञान की आधारशिला है। उन्होंने विद्यार्थियों से रटने की प्रवृत्ति से आगे बढ़कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया।
महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. वाय. के. मिश्र ने अध्यक्षीय उद्बोधन में विद्यार्थियों को जिज्ञासा, आत्मचिंतन और अनुसंधान की भावना विकसित करने के लिए प्रेरित किया। इस अवसर पर प्रो. गिरीश्वर मिश्रा पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा भी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े और शिक्षा को समाज तथा वैश्विक कल्याण से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
इस अवसर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अध्यक्ष श्री चेतन गुर्जर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के परिप्रेक्ष्य में ऐसे शैक्षणिक आयोजन निरंतर होते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल सूचना प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान, आलोचनात्मक सोच, सकारात्मक दृष्टिकोण और विश्लेषणात्मक क्षमता के विकास का आधार भी है।
संगोष्ठी की प्रस्तावना राष्ट्रीय सेमिनार के संयोजक डॉ. विनोद शर्मा ने प्रस्तुत की तथा संचालन डॉ. सी. एल. शर्मा ने किया। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. के. एल. जाट, पूर्व प्राचार्य, स्वामी विवेकानंद शासकीय महाविद्यालय, नीमच ने की। उन्होंने भारत में उच्च शिक्षा में शोध संस्कृति को प्रोत्साहित करने तथा शोध पद्धति में आधुनिक उपकरणों और तकनीकों के उपयोग की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। इस सत्र में बीज वक्ता प्रो. तुषार बनर्जी (देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर) रहे, जिन्होंने “कृषि चुनौतियों से टिकाऊ समाधानों की ओर: एग्रोकेमिकल अनुप्रयोगों के लिए CGTase-मध्यस्थित β-साइक्लोडेक्सट्रिन का उत्पादन” विषय पर अपना शोध कार्य प्रस्तुत किया।
द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. पी. बी. रेड्डी, प्राचार्य, शासकीय महाविद्यालय, नागदा ने की तथा बीज वक्ता प्रो. सखाराम मुजाल्दा (देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर) ने शोध पद्धतियों की विभिन्न आधुनिक तकनीकों पर विस्तृत जानकारी दी।
तकनीकी सत्रों में विभिन्न शोधार्थियों एवं प्राध्यापकों ने अपने अनुसंधान पत्र प्रस्तुत किए। इनमें प्रमुख रूप से डॉ. ऋतम उपाध्याय, डॉ. मीनाक्षी श्रीवास्तव, डॉ. तबस्सुम पटेल, डॉ. अर्जुन सिंह पंवार, डॉ. दीक्षा गुप्ता, प्रो. आदर्श भेवंदिया, राहुल मेहता, प्रो. पूनम चौधरी, प्रीति वर्मा, डॉ. राकेश कुमार परमार, डॉ. मीनाक्षी हरोड़, प्रो. आयुषी सोनी, डॉ. सौरभ गुर्जर तथा श्री निलेश पाटीदार सहित अनेक विद्वानों ने अपने शोध पत्रों का प्रस्तुतीकरण किया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. सी. एल. शर्मा एवं प्रो. रविकांत मालवीय ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ. अंजेला सिंगारे एवं प्रो. ललिता मरमट द्वारा किया गया।