स्टेशन रोड स्थित चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में प्रवचन, आधुनिक जीवनशैली पर उठाए सवाल, संयम और मर्यादा अपनाने का आह्वान



रतलाम 24 अप्रैल । चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में विराजित मुनि श्री 108 निर्णय सागर जी महाराज के सान्निध्य में आयोजित धर्मसभा में शुक्रवार को आध्यात्मिक वातावरण छा गया। अपने ओजस्वी और प्रेरणादायक प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि जीवन की वास्तविक समृद्धि धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि श्रेष्ठ संस्कारों और आत्मसंयम में निहित होती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि चाहे बंधन सोने का हो या लोहे का, बंधन तो बंधन ही होता है। इसी प्रकार भौतिक सुख-सुविधाएं व्यक्ति को आकर्षित जरूर करती हैं, लेकिन अंततः उसे मोह और आसक्ति में बांध देती हैं। इसलिए व्यक्ति को बाहरी दिखावे के बजाय आंतरिक शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए।
मुनि श्री ने पारिवारिक जीवन की मर्यादाओं पर विशेष बल देते हुए कहा कि माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बच्चों में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण करना है। यदि परिवार में अनुशासन और नैतिकता का पालन होगा, तो समाज स्वतः ही सुदृढ़ बनेगा। उन्होंने महिलाओं की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि घर की संस्कृति और वातावरण का निर्माण मातृशक्ति के हाथ में होता है। यदि घर में मर्यादा और धर्म का पालन होगा, तो आने वाली पीढ़ियां भी उसी मार्ग पर अग्रसर होंगी।
समकालीन जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनि श्री ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग सुविधा और भोग के पीछे दौड़ रहे हैं, जिससे नैतिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है। ऐसे समय में धर्म, संयम और सदाचार ही जीवन को संतुलित और सार्थक बना सकते हैं। प्रवचन के अंत में उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में अहिंसा, संयम और सदाचार को अपनाकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन के वाहक बनें। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने गहन श्रद्धा के साथ प्रवचन का लाभ प्राप्त किया।