रतलाम । वरिष्ठ साहित्यकार देवव्रत जोशी लिक और परंपराओं से हटकर लिखने वाले कवि थे उनके लेखन में सहज, फक्कड़ पन और कल्पनाओं का सागर बहता था । विचारों पर अडिग रहने वाला अद्भुत साहित्यकार जो अपने लेखन और कविताओं में आम मानवी जीवन के दुख दर्द को करता था। संवेदना ओं का प्रतिबिंब उनके लेखन में झलकता तुलसीदास जी को कवि नहीं मानते थे लेकिन रामायण की चौपाइयां और छंद उन्हें वो मुँह-जवानी याद रहते थे । कबीर और रैदास को स्मरण करते हुए कविताओं का पाठ करते सुनना बड़ा अच्छा लगता था । मालवा के ऐसे प्रखर साहित्यकार कवि का चले जाना बेहद दुखद है । उक्त विचार प्रसिद्ध कवि लेखक साहित्यकार डॉ. देव जोशी के निधन पर शिक्षक सांस्कृतिक संगठन द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा में साहित्यकार डॉ चांदनी वाला ने व्यक्त किए संस्था अध्यक्ष दिनेश शर्मा ने कहा कि डॉ. जोशी जी को मंच द्वारा उनकी उल्लेखनीय साहित्य सेवा के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड देखकर सम्मानित किया था । वह शहर के बहुत ही सम्मानित और उच्च कोटि के कवि थे उनकी रचनाओं में मालवा की संस्कृति झलकती थी । सर्व श्री कृष्ण चंद्र ठाकुर, डॉ. सुलोचना शर्मा, गोपाल जोशी, ओपी मिश्रा, राधेश्याम तोगड़े, नरेंद्र सिंह राठौर, रमेश उपाध्याय दिलीप वर्मा, श्याम सुंदर भाटी, देवेंद्र वाघेला, चंद्रकांत वाफगांवकर, बीके जोशी, भारती उपाध्याय, कविता सक्सेना, मिथिलेश मिश्रा, राजेंद्र सिंह राठौड़, दशरथ जोशी, अनिल जोशी, मदन लाल मेहरा, रमेश चंद परमार, आरती त्रिवेदी आदि उपस्थित थे ।