ज्ञान की शुरुआत कान से होती है और कर्म की शुरूआत वाणी से होती है  इसलिए पहले श्रवण करना फिर वर्णन करना  – शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद जी तीर्थ

रतलाम 28 अप्रैल। शास्त्रों में सबसे पहले श्रवण को श्रेष्ठ कहा गया है सुनना अपने इष्ट के नाम को श्रवण करना क्योंकि शब्द कान से हृदय में पहुंचता है श्रवण और कीर्तन बाद में मनन, ध्यान, वंदन, पूजन, अर्चन करना होता है । श्रवण और कीर्तन को आधार लेकर जीवन में भक्ति मार्ग प्रशस्त करना चाहिए । शरीर में आत्मा होती है लेकिन वह छुपी हुई है । जिससे अंदर ज्ञान है वह उसके निकट होते है तो वह भक्ति हो जाती है । चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए क्यों कि चिंता से समस्या का निदान नहीं होता बल्कि चिंतन करने से ही समस्या के हल का मार्ग मिलता है ।  उक्त वक्तव्य अखिल भारतीय रामायण मेला के अन्तर्गत शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंदजी तीर्थ ने अपने मुखारबिन्द से जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुए कहें ।
अ. भा. रामायण मेला त्रिवेणी मेला ग्राण्ड के पास शिवालय कॉलोनी में चल रहे   रामा$यण मेला में स्वामी देवस्वरूपानंद जी (अखंड ज्ञान आश्रम) ने भी सम्बोधित करते हुए रामायण मेला पुन: प्रारम्भ करने के लिए पं. राजेश दवे एवं दवे परिवार को साधुवाद दिया । आपने कहा कि इसे शंकराचार्य जी के द्वारा ही पुन: प्रारम्भ करना गर्व की बात है। जीवन में संतों का सानिध्य करना भक्ति करना ही बड़ी भक्ति है ।  संतो का सानिध्य भाग्यशाली को ही मिलता है।
प्रारम्भ मेें श्री रामचरित मानस का पूजन भव्या गौरव दवे द्वारा किया गया। इस अवसर पर पं. राजेश दवे, अनिल झालानी अध्यक्ष सनातन धर्म सभा, झमक भरगट अध्यक्ष सर्राफा एसोसिएशन, अतुल गौड़ पिपलौदा नगर परिषद अध्यक्ष, उद्योगपति संदीप व्यास,  नवनीत सोनी, सत्यनारायण पालीवाल ने भी संतो का स्वागत सम्मान कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर अनिल झालानी द्वारा उपस्थित धर्मालुजनों के साथ भरपूर वर्षा के लिए प्रार्थना की गई । कार्यक्रम पश्चात आरती कर प्रसादी वितरण की गई ।
इस अवसर पर शांतिलाल पाटीदार, रामप्रसाद पाटीदार, दिनेश पाटीदार, निरंजन पंड्या, सुनील राठौर, रूपेश पाटीदार सहित बड़ी संख्या में धर्मालुजन उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन ध्रुव पारखी ने किया।

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