रतलाम । उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास श्री आर के सिंह ने बताया कि नरवाई (पराली) अवशेष जलाने से भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाती है कीमती भूसे की हानि होती है हमारे मित्र कीट केंचुआ, सांप सुक्ष्म जीव आदि आग में नष्ट हो जाते है मिट्टी की संरचना खराब हो जाती है, जिससे भूमि की जल धारण क्षमता कम होकर जुताई में अधिक उर्जा की खपत होती है। पर्यावरण दूषित होता है तथा धरती का तापमान बढ़ता है। कार्बन की मात्रा कम हो जाती है। नरवाई जलाने से जन-धन तथा जंगलों के नष्ट होने की संभावना होती है नरवाई जलाने से होने वाले नुकसान से बचे, किसान भाई नरवाई में आग न लगायें।
वर्तमान में गैंहू की खेती यंत्रीकरण का उपयोग बढ़ने से गैंहू की कटाई कम्बाइन, हार्वेस्टर, ट्रेक्टर द्वारा आसानी से समय पर की जा रही है, किन्तु उससे गैंहू डंठल में याने नरवाई एवं भूसा खेत में छोड़ दिये जाता है जिसको किसान भाई कचरा समझ कर आग से जला देते है। गैंहू की नरवाई में आग लगने से सिर्फ नरवाई ही नही जलती उसमें जमीन के अन्दर उपस्थित सभी सुक्ष्म जीव तापक्रम बढ़ने से समाप्त हो जाते है। परिणाम स्वरूप जली हुई भूमि मृतावस्था में परिणित हो जाती है जिसको सजीव होने में कई वर्ष लग जाते है नरवाई जलाना न केवल किसान के लिए हानीकारक है अपितु प्रकृति, पर्यावरण, भूमि का भी प्रदुषण होता है। खेतो, में आग लगाने से प्रत्येक्ष रूप से बड़ा नुकसान होता है।
किसान भाइयों से अपिल है कि खेतो में नरवाई बिल्कुल नही जलायें तथा विभिन्न रूप से नरवाई का उपयोग खाद बनाने में – भूसा बनाने में उपयोग करें। जिला कण्ट्रोल रूम के प्रभारी सहायक संचालक कृषि श्री भीका वास्के एवं सह प्रभारी सहायक कृषि अभियांत्रिकी श्री विजय मीना से कंट्रोल रूम नंबर 07412- 299061 पर चर्चा कर सकते है।