जावरा में फलणीकर वाटिका से सिंहस्थ तक एक अधिकारी अनगिनत कीर्तिमान

सेवानिवृत्त डी.आई.जी महेश जैन का सफर: ईमानदारी नावाचार और आत्मीयता की मिसाल

जावरा (अभय सुराणा) । सेवा के लंबे और गौरवशाली सफर में सेवानिवृत्त डीआईजी नारकोटिक्स श्री महेश जैन ने जहां भी दायित्व निभाया, वहां केवल प्रशासनिक कार्य ही नहीं किए, बल्कि अपने रचनात्मक दृष्टिकोण और जनहितकारी सोच की अमिट छाप भी छोड़ी।
वर्ष 2004-05 में जावरा में एसडीओपी के रूप में पदस्थापना के दौरान उन्होंने अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। जावरा में पूर्व एसडीओपी श्री प्रमोद फलणीकर के ऐतिहासिक एवं जनहितैषी कार्यों से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने नगर को एक सुंदर और उपयोगी सौगात के रूप में “फलणीकर वाटिका” के विकास में विशेष योगदान दिया। इस वाटिका का उद्घाटन तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक श्री वरुण कपूर के करकमलों से संपन्न हुआ, जो आज भी उनकी सकारात्मक सोच और समाज के प्रति समर्पण का प्रमाण है।
इसके पश्चात आलोट में एसडीओपी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने वहां के जर्जर पुलिस कार्यालय का कायाकल्प कर दिया। सीमित संसाधनों और अनेक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने कार्यालय को नई पहचान दिलाई। इसी दौरान जनहित को सर्वोपरि रखते हुए उन्होंने एक नई पुलिस चौकी के निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य भी पूर्ण कराया। अनावश्यक दबावों की परवाह किए बिना आमजन की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए चौकी का निर्माण कराया तथा उसका विधिवत उद्घाटन भी संपन्न करवाया। यह उनके दृढ़ निश्चय और परिणामोन्मुखी कार्यशैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
24वीं बटालियन में कमांडेंट के रूप में उनका कार्यकाल भी अत्यंत यादगार रहा। उन्होंने लाखों रुपये के निर्माण कार्य करवाए, नए उद्यान विकसित किए, बच्चों के लिए खेल उपकरण लगवाए तथा आवश्यक भवनों का निर्माण कराया। उनके प्रयासों का उद्देश्य केवल अधोसंरचना का विकास नहीं था, बल्कि जवानों और उनके परिवारों के लिए बेहतर एवं सुखद वातावरण तैयार करना भी था। उन्होंने ऐसी व्यवस्थाएं विकसित कराईं, जहां परिवार दिनभर की व्यस्तता के बाद सुकून के कुछ पल बिता सकें।
उनके कार्यकाल में पहली बार बड़े स्तर पर नवरात्रि महोत्सव का आयोजन हुआ, जिसमें जवानों और उनके परिवारों की सक्रिय सहभागिता रही। विभिन्न प्रतियोगिताओं एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया गया तथा प्रतिभागियों को सम्मानित भी किया गया।
नीमच, रतलाम, इंदौर सहित जहां-जहां भी उन्होंने सेवाएं दीं, वहां अपनी ईमानदारी, कार्यकुशलता और नवाचारपूर्ण सोच से विशेष पहचान बनाई। रेलवे पुलिस अधीक्षक के रूप में सिंहस्थ महापर्व के दौरान उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। करोड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही के बीच उन्होंने व्यवस्थाओं पर निरंतर पैनी नजर रखी। उनकी सूझबूझ, सतर्कता और कुशल प्रबंधन के कारण इतनी विशाल भीड़ के बावजूद कहीं भी अव्यवस्था या भगदड़ जैसी स्थिति निर्मित नहीं हुई। वे स्वयं प्लेटफॉर्म पर पहुंचकर व्यवस्थाओं का निरीक्षण करते थे। उनके लिए व्यक्तिगत सुविधाओं से अधिक महत्वपूर्ण उनका कर्तव्य था। यही समर्पण उन्हें एक विशिष्ट अधिकारी बनाता है।
उनकी उत्कृष्ट सेवाओं, अनुकरणीय कार्यशैली एवं उल्लेखनीय योगदान के लिए मध्यप्रदेश शासन द्वारा उन्हें विशेष सम्मान एवं पुरस्कारों से भी अलंकृत किया गया।
जावरा से उनका विशेष आत्मीय संबंध आज भी बना हुआ है। यहां के अनेक परिवारों से उनके पारिवारिक एवं स्नेहपूर्ण संबंध हैं। समय-समय पर उनका जावरा आगमन होता रहता है और जावरा के लोग भी उन्हें सदैव अपने बीच देखने के इच्छुक रहते हैं। उनका सरल, मिलनसार और आत्मीय व्यक्तित्व लोगों के हृदय में विशेष स्थान रखता है।
वास्तव में श्री महेश जैन का संपूर्ण सेवाकाल इस बात का उदाहरण है कि यदि इच्छाशक्ति, ईमानदारी और समाजहित की भावना हो तो प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ स्थायी और प्रेरणादायी रचनात्मक कार्य भी किए जा सकते हैं।

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