
इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । वर्तमान में इंदौर की पावन धरा पर अनेक पूज्य आचार्य ,निर्यापक उपाध्याय, मुनि जैन संतों का सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। यह सर सेठ हुकुमचंद की धर्म नगरी इंदौर नगर का परमसौभाग्य है कि एक साथ इतने तपस्वी, त्यागी और ज्ञान के सागर संत हमें धर्म का मार्ग दिखा रहे हैं सिखा रहे हैं। राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि ऐसे पुण्य अवसर पर यह अत्यंत आवश्यक है कि हम अपनी श्रद्धा भक्ति को किसी बाहरी मापदंड से न तौलें। और किसी संत की महिमा का आकलन कलश स्थापना की बोली, कलशों की संख्या, या आर्थिक योगदान से करना जैन संस्कृति आगम के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के राकेश गोहिल,मंयक जैन ने कहा कि जैन परंपरा में प्रत्येक संत त्याग, तप, संयम और ज्ञान की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं। वर्ण, वेश और आचार में भिन्नता होते हुए भी सभी संत मोक्ष मार्ग के पथ प्रदर्शक हैं। प्रत्येक संत अपने कठोर तप, मौन साधना और आत्म-अनुशासन से पूजनीय हैं। वरिष्ठ समाजसेवी डॉ जैनेन्द्र जैन ने कहा कि हमारा कर्तव्य है कि हम धन या आयोजन को श्रेष्ठता का आधार न बनाएं। जिस श्रद्धालु को जिस संत के सान्निध्य में धर्म, शांति और आत्मकल्याण का प्रकाश मिले, वह वहीं नतमस्तक होकर आशीर्वाद प्राप्त कर नमोस्तु शासन को जयवंत करें यही सच्ची धार्मिक भावना है।आओ हम सब प्रतीज्ञा लें कि हम सभी मिलकर मन, वचन और कर्म से प्रत्येक संत के प्रति समान श्रद्धा, विनय और आदर का भाव रखेंगे।यही हमारी जैन संस्कृति की सच्ची पहचान है और यही हमारी सच्ची साधना भी।इंदौर की वशुंधरा आज अनेक पूज्य संतों से आलोकित है।
किसी संत को बड़ा-छोटा मानने का आधार न धन है, न आयोजन। नमोस्तु शासन जयवंत हो।