संयोग-वियोग जीवन का शाश्वत सत्य, गुरु में आस्था से दुर्लभ साधन भी होते हैं सुलभ : महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती

दिव्य चातुर्मास महोत्सव में कठोपनिषद एवं श्रीमद्भागवत कथा का हुआ आयोजन, गुरु-भक्ति, समर्पण और नवधा भक्ति का किया विस्तृत विवेचन

रतलाम, 5 अगस्त 2026 (बुधवार)। स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कथा एवं प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
अपने उद्बोधन में आचार्य महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती ने कहा कि संयोग और वियोग जीवन का शाश्वत नियम है। भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि माता के मंदिर में श्रीराम और माता सीता का मिलन संयोग था, वहीं रावण द्वारा माता सीता का हरण वियोग का प्रसंग है। इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में भी संयोग और वियोग दोनों का समावेश रहा। जीवन में आने वाले इन दोनों पक्षों को समभाव से स्वीकार करना ही आध्यात्मिक परिपक्वता का परिचायक है।
उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति को गुरु के वचनों और विचारों पर आस्था नहीं होती, वह स्वप्न में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। गुरु के प्रति प्रेम, श्रद्धा और विश्वास होने पर दुर्लभ साधन भी सहज उपलब्ध हो जाते हैं। गुरु-कृपा से मनुष्य प्रेय और श्रेय दोनों की प्राप्ति करता है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग राजनीति और मीडिया के सहारे आगे बढ़ते हैं, जबकि कुछ केवल गुरु-कृपा के बल पर जीवन में उच्चतम उपलब्धियां प्राप्त करते हैं। गुरु पर पूर्ण निष्ठा रखने वाला साधक जीवन की कठिनाइयों को सरलता से पार कर लेता है।
प्रवचन के दौरान उन्होंने माता पार्वती की तपस्या का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भगवान शिव ने ब्राह्मण का रूप धारण कर उनकी परीक्षा ली। माता पार्वती ने कठोर तप, त्याग और धैर्य के माध्यम से स्वयं को शिवतुल्य बनाया। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में माता सती को अग्नि में आत्माहुति देनी पड़ी और पार्वती रूप में कठोर तप करना पड़ा। जब वे शिव के समान हो गईं, तभी गोस्वामी तुलसीदास ने उन्हें “शिवा” रूप में संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जब तक मन, कर्म और वचन एक सूत्र में नहीं आते, तब तक वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है।
महामंडलेश्वर ने शबरी और भगवान श्रीराम के संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि भक्ति का प्रथम सोपान संतों की शरण ग्रहण करना है। इसके साथ ही उन्होंने श्रद्धालुओं को नवधा भक्ति का महत्व भी समझाया।
भगवान श्रीकृष्ण और भक्त के संबंध का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान स्वयं भक्तों के पीछे चलते हैं और जहां भक्त के चरण पड़ते हैं, वहां की चरण-रज अपने मस्तक पर धारण करते हैं। उन्होंने कहा कि भक्त है तो भगवान हैं, भक्त के बिना भगवान की महिमा भी अधूरी है।
महाभारत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि द्रौपदी ने जब पूर्ण समर्पण भाव से भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया, तभी भगवान ने उसकी लाज की रक्षा की। उन्होंने कहा कि संकट के समय ही नहीं, प्रत्येक क्षण ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। सच्चे समर्पण पर भगवान स्वयं अपने भक्त की रक्षा के लिए उपस्थित हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि संसार में मित्र, पत्नी और पुत्र भी सदैव साथ नहीं रह सकते, किंतु ईश्वर यदि हृदय में बस जाएं तो उनका साथ कभी नहीं छूटता। इसलिए बाहरी संबंधों से अधिक आंतरिक ईश्वर-स्मरण और गुरु-निष्ठा को महत्व देना चाहिए।
संध्याकालीन आरती आचार्य संजय मिश्रा शास्त्री ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न कराई।
इस अवसर पर श्रीमाली ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष नयन व्यास, कुलदीप त्रिवेदी, प्रीति व्यास, अखिलेश शर्मा, सुरेश दवे, शुभ दशोत्तर, प्रशांत व्यास, भूपेंद्र व्यास, शरद व्यास, अशोक दीक्षित तथा विशाल हिंदू सेवा के जिला अध्यक्ष राकेश शर्मा, प्रवीण वाघेला, सुधीर पाटीदार, सुरेश राठौर, संतोष शर्मा, सचिन वर्मा, देवेंद्र शर्मा, नवीन पंवार, राधेश्याम बोदलिया, हेमंत शर्मा, सोनू राव, कलावती मालवीय, निखिल शर्मा, भावना राठौर, प्रमिला चौहान, अरुणा सेन सहित अखंड ज्ञान आश्रम के संतगण एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिला-पुरुष उपस्थित रहे।

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