
मूणत परिवार में नेत्रदान की परंपरा जारी, बड़े भ्राता वर्धमान मूणत एवं सौभाग्यमल मूणत के भी हो चुके हैं नेत्रदान
रतलाम। मानव जीवन की सच्ची सार्थकता केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि जीवन के बाद भी किसी के काम आने में है। इसी मानवीय भावना को चरितार्थ करते हुए रामगढ़ निवासी सराफा व्यवसायी स्वर्गीय पन्नालाल मूणत के सुपुत्र बसंतीलाल मूणत के असामयिक निधन के पश्चात उनके परिवार ने नेत्रदान का पुनीत निर्णय लेकर समाज के सामने मानवता की प्रेरणादायी मिसाल प्रस्तुत की।
प्रितेश गादिया एवं हेमन्त मूणत की प्रेरणा से बसंतीलाल मूणत के पुत्र अभय मूणत तथा पौत्र प्रियांशु (प्रिंस) मूणत एवं श्रेयांश मूणत ने नेत्रदान की सहमति प्रदान की। अपने प्रियजन को खोने के दुःख के बीच परिवार द्वारा लिया गया यह निर्णय उनकी संवेदनशीलता, संस्कार एवं मानव सेवा के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
मूणत परिवार में नेत्रदान बना सेवा का संस्कार
इस नेत्रदान की सबसे विशेष और प्रेरणादायी बात यह है कि मूणत परिवार में नेत्रदान की भावना पहले से ही सेवा-संस्कार के रूप में विद्यमान है। बसंतीलाल मूणत के बड़े भ्राता वर्धमान मूणत एवं सौभाग्यमल मूणत का भी पूर्व में नेत्रदान हो चुका है।
परिवार ने अपने प्रियजनों के नेत्रदान की इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब बसंतीलाल मूणत के निधन के पश्चात भी मानवता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यह केवल एक नेत्रदान नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मानव सेवा के संस्कारों को आगे बढ़ाने का अनुकरणीय उदाहरण है।
समय पर सूचना से संपन्न हुई नेत्रदान प्रक्रिया
नेत्रम संस्था के हेमन्त मूणत ने बताया कि परिजनों की सहमति मिलते ही बड़नगर गीता भवन न्यास के ट्रस्टी एवं नेत्रदान प्रभारी डॉ. जी.एल. ददरवाल को सूचना दी गई। सूचना मिलते ही डॉ. ददरवाल तत्काल रतलाम पहुंचे और नेत्रदान की संपूर्ण प्रक्रिया विधिवत रूप से संपन्न कराई।
परिजनों की तत्परता और सकारात्मक सोच के कारण समय पर नेत्रदान संभव हो सका। यह नेत्रदान किसी जरूरतमंद के जीवन में रोशनी की नई उम्मीद जगाने का माध्यम बनेगा।
दुःख को मानव सेवा के संकल्प में बदला
किसी अपने को खोने का दर्द परिवार के लिए अत्यंत कठिन होता है, लेकिन मूणत परिवार ने इस दुःख की घड़ी में भी मानवता को प्राथमिकता दी। बसंतीलाल मूणत भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके नेत्र किसी जरूरतमंद की दुनिया को रोशन करने का माध्यम बनेंगे।
मृत्यु जीवन का अंत हो सकती है, लेकिन सेवा और मानवता का अंत नहीं। बसंतीलाल मूणत का नेत्रदान इसी भावना को सार्थक करता है।
समाजजनों ने दी श्रद्धांजलि
नेत्रदान के अवसर पर कांतिलाल मूणत, अशोक मूणत, मंगल मूणत, सुरेश मालवी, पारस पितलिया, मुकेश कटारिया, राजकुमार मूणत, सुरेन्द्र मूणत, संजय बम्बोरी, अर्पित मालवी, हेमन्त मूणत, नवनीत मेहता, शलभ अग्रवाल, सुशील मीनू माथुर, राकेश कोठारी, मनोज भंडारी, पंकज गामी, मोहित जैन एवं सौरभ जैन सहित समाजजन एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
सभी ने मूणत परिवार के इस पुनीत निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि नेत्रदान महादान है। मृत्यु के बाद किसी की आंखें किसी दूसरे व्यक्ति की दुनिया में उजाला बन जाएं, इससे बड़ी मानव सेवा और क्या हो सकती है।
नेत्रम एवं गीता भवन न्यास ने किया सम्मान
नेत्रदान की प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात नेत्रम संस्था एवं गीता भवन न्यास की ओर से मूणत परिवार को प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया तथा इस पुनीत कार्य के लिए परिवार के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
वर्धमान मूणत एवं सौभाग्यमल मूणत के पूर्व नेत्रदान और अब बसंतीलाल मूणत के नेत्रदान ने मूणत परिवार की मानव सेवा की परंपरा को और मजबूत किया है। यह परिवार समाज को संदेश दे रहा है कि अच्छे संस्कार केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में दिखाई देते हैं।
“रिश्ते शरीर के साथ समाप्त नहीं होते, अच्छे संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। नेत्रदान से मिली रोशनी किसी एक व्यक्ति की आंखों में नहीं, बल्कि मानवता के उज्ज्वल भविष्य में चमकती है।”
नेत्रम संस्था ने समाज के सभी वर्गों से अपील की कि नेत्रदान के प्रति जागरूक बनें, भ्रांतियों को दूर करें और अपने परिवार में नेत्रदान को सेवा एवं संस्कार के रूप में अपनाएं। किसी की अंतिम विदाई यदि किसी दूसरे के जीवन में रोशनी बन जाए, तो इससे बड़ी मानवता की मिसाल और कोई नहीं हो सकती।