

इंदौर (राजेश जैन दद्दू_ पुण्य पुरुषों की प्रशंसा और अपनी निंदा करना ही भक्ति है। जिसकी भक्ति करो उसमें दोष मत देखना, यदि दोष देखोगे तो तुम्हारी भक्ति खंडित हो जाएगी और तुम भक्ति नहीं कर पाओगे। तुम्हारी आत्मा कहे कि तुम जिसकी आराधना कर रहे हो उसमें कोई दोष, दुर्गुण नहीं हैं उसी दिन तुम्हारी भक्ति सार्थक हो जाएगी। जो 18 दोषों से रहित हैं और जिसने राग,द्वेष कामादिक पर विजय पाली है वही तुम्हारा सच्चा भगवान है और उसे ही तुम भगवान मानना और उसकी भक्ति करना। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि यह बात शुक्रवार को जगत पूज्य मुनि पुंगव सुधा सागर जी महाराज ने दलाल बाग स्थित देशना मंडप में एक महिती धर्म सभा में कही।
मुनिश्री ने कहा कि यदि सारा जगत भी कहे कि तुम्हारे भगवान में दोष है तो तुम उस पर विश्वास मत करना और कहना कि मेरे भगवान में किंचित भी दोष नहीं वे निर्दोष हैं इसलिए मैं उन्हें भगवान मानता हूं और उन्हें नमोस्तु कर उनकी भक्ति करता हूं। यदि वह सारे दोष जो तुम में है यदि वह भगवान में भी तुम्हें दिखाई दें तो उन्हें तुम भगवान मत मानना और उनकी भक्ति मत करना।
जगत पूज्य ने यह भी कहा
सदोष को नमोस्तु नहीं किया जाता।
पुण्य बंध साधु को आहार देने,कराने से नहीं होता अपने घर चौका लगाने से होता है। चौका लगाना ही पुण्यात्मा की निशानी है।
पुण्य पुरुषों और बड़े लोगोंके सामने न तो अपनी अच्छाई का बखान करना और ना हीअपने आपको श्रेष्ठ प्रस्तुत करने का भाव करना।
भगवान में चमत्कार नहीं उनकी भक्ति में चमत्कार है।
गुरु साधु और भगवान के समक्ष आशीर्वाद लेने के लिए नहीं उन्हें नमोस्तु करने के लिए जाना।
सुखी होना चाहते हो तो पहले दुखी होकर बताओ।
अपराधी वह है जिसे अपराध करने पर भी बरी होने का भाव आ रहा है।
गुरु का सच्चा शिष्य वह है जो अपने अपराध, दोष अपने गुरु को निसंकोच बताता है।