
कविता – संजय एम तराणेकर
यूं “डिजिटल युग” में कदम बढ़े थे,
नकदी से हमने ही नाता तोड़ा था।
हमको यूपीआई ने ही राह दिखाई,
हर भुगतान को सरल बनाया था।
मगर अब शुल्क की आहट हैं आई,
तब तो सोच में पड़ गया हैं बाजार।
ये छोटा-सा चार्ज भी बन सकता है,
नकदी नोट की वापसी का आधार।
हाँ, कभी जेब में सिक्के खनकते थे,
नोटों से होता था सबका कारोबार।
फिर मोबाइल ने यहाँ जगह बना ली,
डिजिटल पेमेंट हुआ हरेक व्यवहार।
कागज के नोटों से मुक्ति का सपना,
ये सुविधा ने सच करके दिखलाया।
लेकिन शुल्क की छोटी-सी दीवार ने,
फिर से नकदी का रास्ता हैं सुझाया।
व्यापारी बोलते हैं लेन-देन सस्ता हो,
ग्राहक बोले-भुगतान सभी सरल हो।
हमेशा तकनीक वो अच्छी कहलाए,
जिसमें हर वर्ग का हित नज़र आए।
आज यूपीआई भारत की पहचान है,
क्या कहें यहीं सुविधा बेमिसाल रहें।
न शुल्क का बोझ बढ़े जनता पे भार,
न नकद की मजबूरी फिर बहाल रहें।
डिजिटल भारत तब सफल कहलाए,
जब सुविधा सभी के द्वार तक जाए।
अब नकदी हो या डिजिटल भुगतान,
जन-जन की जेब पर बोझ ना आए।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986