- जैन दिवाकर पूज्य गुरुदेव श्री चौथमल जी महाराज के उदयपुर वर्षावास के समय आपके प्रवचनों से लिए गए संक्षिप्त अंश -19
- प्रवचनकार – जैन दिवाकर पूज्य गुरुदेव श्री चौथमल जी महाराज
- साभार – आदर्श उपकार
- लेखक – उपाध्याय श्रीप्यारचंदजी महाराज
- संकलन/प्रस्तुति – सुरेंद्र मारू, इंदौर
जीवन में श्रद्धा का एक महत्वपूर्ण स्थान है। बिना श्रद्धा के मनुष्य का मन चंचल, संदिग्ध और नास्तिक बन जाता है। श्रद्धाहीन जन अपने जीवन का पूर्ण विकास नहीं कर सकता। पर श्रद्धा में विवेक का मिश्रण करो जिससे तुम्हारी श्रद्धा, अंधश्रद्धा न बन जाए। विवेक की संप्राप्ति करने के लिए तत्व – चर्चा करना आवश्यक है। प्रत्येक बात को बुद्धि की कसौटी पर कसो, उसे परखो पर हठ- आग्रह से दूर रहो।शांति और सहिष्णुता के साथ तत्व का निर्णय करो। जहां जय- पराजय का भाव नहीं होता वहीं लाभप्रद तत्व – चर्चा होती है। केशी और गौतम स्वामी की चर्चा कितनी शांति, गंभीरता और उदारता के साथ हुई थी? उनके ह्रदय में सिर्फ तत्व की जिज्ञासा थी जय – पराजय की भावना ना थी। उदारता पूर्ण विचार विनिमय ज्ञान – प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। अतएव शुद्ध जिज्ञासा की भावना से तत्व- चर्चा करके ज्ञानियों के ज्ञान का लाभ उठाओ, उनके अनुभव पूर्ण उदगार सुनो, उनकी साधना के फल को समझोअपने अध्ययन- चिंतन – मनन में उनसे बड़ी सहायता मिलेगी।