- साभार : जैन दिवाकर ज्योतिपुंज खंड – 3/ पेज 161
- प्रस्तुति : सुरेन्द्र मारू

एक बड़े आदमी ने मुझसे पूछा – धर्म क्या चीज़ है? मैने उससे कहा – “धर्म को समझना चाहते हो तो पहले धर्म के विरोधी पाप को समझो। पाप को समझ लेने से धर्म जल्दी समझ में आ जायगा। देखो, किसी प्राणी को सताना पाप है, झूठ बोलना पाप है, चोरी करना पाप है, परस्त्री को ताकना पाप है, धन का अमर्याद संग्रह पाप है, ममत्व रखना पाप है, क्रोध करना, घमंड करना, कपट करना और लोभ-लालच करना पाप है। राग -द्वेष करना भी पाप है।” यह सुन कर उसने कहा – “ठीक है। ये सब बातें मेरी समझ में आ गई।” मैने कहा -अगर पाप को आपने समझ लिया तो धर्म भी आपकी समझ में आ जाना चाहिए। इन पापों का आचरण न करना और अच्छे-अच्छे काम करना ही धर्म है। जहां धर्म है वहां सुख है।