महाप्रयाण के दो वर्ष पूर्ण होने पर भी आचार्य भगवन मेरे गुरुवर हमसब के गुरुवर संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्या सागर जो महामुनिराज अभी भी यहीं हैं

“जाते नहीं महासंत धरा से, वह तो अमर हो जाते हैं…”

झुमरीतिलैया। यह मात्र कल्पना नहीं, अपितु एक शाश्वत सत्य है। ऐसा लगता ही नहीं-और न कभी लगेगा-कि महापुरुष इस धरा को छोड़कर जाते हैं। अवतार पुरुष जब अवतरित होते हैं, तो वे विदा नहीं होते; वे तो भक्तों के हृदय में सदा के लिए विराजमान हो जाते हैं। हमारे हृदय सम्राट आचार्य श्री108 विद्यासागर भगवन आज भी हमारे भीतर हैं और जब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, वे हमारे मार्गदर्शक बनकर वहीं रहेंगे।कहा जाता है कि शिशु की प्रथम गुरु माँ होती है, जिसने उसे जन्म दिया। किंतु यदि समस्त भक्तों और शिष्यों की दृष्टि से देखा जाए, तो आचार्य भगवन उन सभी के लिए ‘प्रथम’ और ‘सर्वोपरि’ हैं, जो उन्हें अपना सर्वस्व मानते हैं। मुझ जैसे अनगिनत भक्तों का यह अटूट विश्वास है कि आचार्य श्री 108 विद्यासागर मुनिराज कहीं नहीं गए। जब एक महान आत्मा ‘परमात्मा’ बनने की ओर अग्रसर होती है, तो उसका हर क्षण, प्रेम, साधना, त्याग, तपस्या और उपदेश इसी धरा पर अंकित रह जाते हैं। उनकी शिक्षाएं, दीक्षाएं, कालजयी रचनाएं और विद्यागुरुकुल के रूप में उनकी देह से इतर सब कुछ आज भी जीवित है।आज झुमरीतिलैया जैन मंदिर में आचार्य श्री की समाधि दिवस मनाया गया सर्व प्रथम श्री जी की अभिषेक के साथ आचार्य श्री की फ़ोटो के समक्ष दीप प्रज्वलित इंदु जैन सेठी परिवार के द्वारा किया गया इसके बाद समाज के काफी भक्तों ने आचार्य श्री की पूजन अष्ठ द्रब्य के साथ भक्ति भाव के साथ कियाइस अवसर पर आचार्य भक्तों द्वारा आचार्य श्री के जीवन पर प्रकाश डालते हुवे बताया कि गुरुवर पूरे देश मे घूम घूम कर राष्ट्र संस्कृति के उद्धारक, जीव दया ,साहित्य ,आध्यात्मिक बैभव, उपकारों ओर भारत को इंडिया नही भारत कहने का पाठ पढ़ाया ओर आह्वान किया जिनके पद चिंन्हों पर चलते हुवे जैन समाज कार्य कर रही है।
•राष्ट्र और संस्कृति के उद्धारक•
धन्य है वह भूमि, जिसे आचार्य श्री ने अपनी साधना से पवित्र किया। भारत को पुनः ‘सोने की चिड़िया’ बनाने के संकल्प के साथ उन्होंने ‘स्वदेशी’ का मंत्र दिया। उन्होंने जेल के कैदियों तक को करुणा की शरण दी। तिहाड़ जेल जैसे कारागारों में हथकरघा के माध्यम से कैदियों को आर्थिक स्वावलंबन प्रदान करना और उनके परिवारों तक मदद पहुँचाना, गुरुदेव के दूरगामी विजन का ही परिणाम था। देश की बेटियों के लिए ‘प्रतिभास्थली’ जैसा उपकार शायद ही कोई भूल पाए, जो भविष्य के भारत को एक नई दिशा दे रही है।

करुणा और जीव-दया का विस्तार

गुरुदेव ने केवल मनुष्यों को ही मोक्ष मार्ग पर नहीं लगाया, बल्कि तिर्यंच (पशु) जीवों के उद्धार का मार्ग भी प्रशस्त किया। भारतीय संस्कृति में पूजनीय ‘गौ-माता’ की रक्षा के लिए उन्होंने ‘दयोदय’ जैसी विशाल गौशालाओं का आशीर्वाद दिया। आज यदि भारत में सर्वाधिक गौशालाएं संचालित हैं, तो वह आचार्य श्री की ही प्रेरणा है, जो कलियुग में भी हमारी संस्कृति को सुरक्षित रखे हुए हैं। इसी प्रकार, आयुर्वेद पर अटूट विश्वास जगाते हुए ‘पूर्णायु’ के माध्यम से उन्होंने रुग्ण मानवता को निरोगी बनाने का महान कार्य किया।

साहित्यिक और आध्यात्मिक वैभव

आचार्य श्री केवल एक संत नहीं, अपितु इस सृष्टि के अनमोल रत्न थे। उनकी कालजयी कृति ‘मूकमाटी’ महाकाव्य ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। इसमें उन्होंने मिट्टी और कुंभकार के माध्यम से बताया कि कैसे एक साधारण तत्व भी गुरु के सानिध्य से ऊंचाइयों को छू सकता है। नर्मदा के कंकड़ों को शंकर बनाने वाली उनकी अद्वैत कविताएं प्रकृति और अध्यात्म का अनूठा संगम हैं। हमारा परम सौभाग्य है कि हमने ‘विद्या युग’ में जन्म लिया। उन्हीं के पुरुषार्थ से हमें कुंडलपुर के ‘बड़े बाबा’ के भव्य मंदिर और नवीन उच्चासन के दर्शन सुलभ हुए। ऐसी विराट सोच किसी साधारण मनुष्य की नहीं, बल्कि साक्षात ईश्वर स्वरूप महान शक्ति की ही हो सकती है।

उपकारों की अनंत श्रृंखला

गुरुदेव के उपकारों को शब्दों में बांधना असंभव है; संसार के सारे पन्ने और स्याही कम पड़ सकती है, पर उनकी महिमा का पार नहीं पाया जा सकता। उनका स्मरण ही हर संकट को हरने वाला है। संकट के समय जिसने भी एक बार एकाग्रचित्त होकर उनका नाम ले लिया, भय स्वयं भयभीत होकर दूर भाग जाता है।संध्या में गुरुवर की आरती किया गया। साक्षात अरिहंत स्वरूप, समाधि सम्राट महामुनिराज आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की जय! उक्त जानकारी शरणम जैन,जबेरा। उक्त जानकारी संकलन कर्ता कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा ने दी ।

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