जिनका त्याग, समर्पण हो उनका इतिहास लिखा जाता है : उपाध्याय डॉ.गौतममुनि म. सा.

  • हमारा प्रयास एकता का होना चाहिए इसी मे सार है : प्रवर्तक विजयमुनि म.सा.
  • मनभेद को दूर करते एकता से आगे बढ़ने मे युवा शक्ति को आगे आना होगा : डॉ आई ऍम सेठिया
  • मै जैन हूँ यह भाव अपने मन ने होना चाहिए : विधायक ताराचंद जैन
  • अखिल भारतीय श्री जैन दिवाकर संघटन समिति युवा शाखा का राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न

उदयपुर। हमारे पास दो चीज है चित्र और चारित्र, चित्र संत का भी होता है मगर हम उनके चारित्र देखकर श्रद्धा से सिर झुकता है। जैन दिवाकर जी म.सा. का नाम उनके त्याग से चलता है, आज उनके नाम से संप्रदाय चल रही है। आज वर्षो के बाद संघटन समिति वाले जागे है, हमें एक बार जागना है, जो शेर के सामान होता है और जो जग कर सो जाता है वो सियार कहलाता है। संघ के प्रति समर्पण रख़ना होगा, हमें समाज के लिए कुछ करके दिखाना है जो नाम आज चल रहा है वो चित्र से नहीं उनके चारित्र से चल रहा है। जैन दिवाकर जी म.सा. ऐसे महान संत थे जिन्होंने समाज को एकता के सूत्र से बांधा है, जिनका त्याग समर्पण हो उनका इतिहास लिखा जाता है।
उक्त विचार अखिल भारतीय श्री जैन दिवाकर संगठन समिति युवा शाखा के राष्ट्रीय अधिवेशन मे उपाध्याय पूज्य गुरुदेव डॉ.श्री गौतम मुनि जी म. सा ने कहा की जैन दिवाकर जी स्नेह की सरिता मे बहते है वो स्वयं संगठित थे तभी उन्होंने संघठन की स्थापना की।श्री सेठिया जी ने पहला प्रयास किया जिससे आज सभी युवा संघठित हुए है। हम संघ और श्रावको की उपेक्षा नहीं करें, हमारे मन को सहृदय रखना होगा। हमें स्नेह और एकता के सूत्र मे रहकर, संगठित होकर, समर्पण भाव रख कर, सहृदय रहना होगा। हमें अपने जैन दिवाकर जी म.सा के नाम को आगे भी अमर रख़ना है। संघ व्यक्ति से नहीं व्यक्तित्व से बनता है, पुरे श्रमण संघ को जीवित करने वाले जैन दिवाकर जी म.सा थे। जिस गुरु ने इतिहास रचा उसके लिए हम क्या कर रहे है, संतो का सम्मान और पुराने श्रावको का सम्मान होना चाहिए। हम कब तक बटेंगे, कब तक कटेंगे, गुरु के नाम को चलना हो तो हमें समर्पण भाव रखना होगा। जैन दिवाकर म.सा का नाम चलाना है तो एक हो जाओ, संतो के सानिध्य बैठो और अपनी समस्या का समाधान करो। नवजवानों यह समय सोने का नहीं है आप चाहो तो सब कुछ कर सकते हो एकता मे ही सार है।
अधिवेशन को प्रवर्तक पूज्य गुरुदेव श्री विजयमुनि जी म. सा ने सम्बोधित करते हुए कहा की आपकी श्रद्धा और आपकी भक्ति से ही कार्यक्रम सफल होते है। मगर हमें एकता के प्रयास को आगे भी जारी रखना है, यह प्रयास सराहनीय है। जिस गुरुदेव ने अपनी सम्प्रदाय के साथ साथ अन्य सम्प्रदाय को अपनाया वैसे ही हमें सभी को अपनाना होगा। युवा शक्ति को वर्तमान मे जागना होगा, जब जागे तभी सवेरा है अब हमें आगे बढ़ना है पीछे की और नहीं देखना है। जिस घर मे एकता है उसका विकास होता है, हमें जैन समाज मे फुट के बीज नहीं बोना है। हमारे गुरुजनो ने अहिंसा प्रेम का पाठ पढ़ाया हमें उससे भी आगे बढ़ना है।
महा श्रमण पूज्य श्री जिनेद्र मुनि ने म. सा ने सम्बोधित करते हुए कहा की वक्ता बोलता है तो श्रोता सुनता है और जब अगर श्रोता सो जाता है तो समझना चाहिए की वक्ता बक रहा है। हमारे वक्तव्य मे सार होना चाहिए, संघठन का सूत्रपाठ जैन दिवाकर जी म.सा ने किया। उनका नारा है गुरु एक सेवा अनेक को आज हम सार्थक कर रहे है, युवा शक्ति मे जोश है और सभी गुरु भगवंत का आशीर्वाद भी है। ऐसे आयोजन से संघठन सुदृढ़ बनता है, साथ ही श्रमण संघ को बल मिलता है।
उप प्रवर्तक पूज्य श्री चंद्रेश मुनि जी म. सा ने सम्बोधित करते हुए कहा की युवा अधिवेशन मे हमें संघ सुरक्षा और संत सुरक्षा दोनों पर चिंतन करना होगा, जहाँ संघ सुरक्षित रहेगा वहा संत सुरक्षित रहेंगे। गुरुदेव ने कहा था की संगठन मे ही शक्ति है वही संघठन के विकास के तीन सूत्र है पहला प्रेम स्नेह और आत्मीयता, दूसरा समर्पण, और तीसरा सूत्र न किसी की आलोचना करूँगा ना किसी की आलोचना सुनुँगा। यह तीन सूत्र हमारे है तो हमारा विकास कोई नहीं रोक सकता है, आज युवा शक्ति को इन्ही सूत्रों पर चलना चाहिए।
आगम ज्ञाता पूज्य श्री वैभव मुनि जी म. सा ने कहा की जैन दिवाकर संगठन समिति के नेतृत्व मे यह प्रथम बार युवा सम्मेलन आयोजित किया गया यह बड़े हर्ष का विषय है। संगठन समिति की स्थापना पूज्य उपाध्याय प्यारचंद जी म. सा ने जैन दिवाकर जी म.सा के आदर्शो और उद्देश्य को लेकर की गई। समिति ने अनेक उतार चढ़ाव देखे है मगर समय समय पर गुरु भगवंतो ने अपने आशीर्वाद से समिति को आगे बढ़ाया है। और जैन दिवाकर जी म.सा के आदर्शो को श् श्रावको के दिलो मे जमाया है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता है, मगर हमें निरंतर आगे बढ़ना है। सबको मान सम्मान दो, सम्मान दोगे तो आपको भी सम्मान मिलेगा। अपने आप को कभी होशियार मत समझो, हम क्या लाये थे और क्या लेकर जायेंगे। खाली हाथ जाने की बजाय समाज को कुछ देकर जाए, संघ नियम और अनुशासन से चलता है। हम मे अर्पण नहीं समर्पण का भाव, भय नहीं भरोसा और आग्रह नहीं आदर का भाव होना चाहिए।
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी नीलेश बाफना व मुकेश बम ने बताया की पूज्य गुरु भगवंत के उद्बोधन के पश्चात राष्ट्रीय युवा अधिवेशन का प्रथम सत्र का शुभारम्भ संगठन समिति के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री सिद्धराज संघवी ने सामूहिक रूप से जैन दिवाकर चालीसा पाठ से किया। इस अवसर पर मुख्य वक्ता साहित्यकार डॉ. दिलीप धीग, उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन, संघठन समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. आई. एम. सेठिया, राष्ट्रीय महामंत्री राकेश मेहता, कोषाध्यक्ष संतोष चोपड़ा पूर्व राष्ट्रीय का. अध्यक्ष सुनील बम, वरिष्ट संरक्षक केसरीमल संघवी महेंद्र बोथरा, इन्दर मल जैन, रमेश भंडारी, प्रांतिय अध्यक्ष डॉ. सुधीर जैन, पूर्व युवा अध्यक्ष मनीष मारु, विनोद कंठलिया युवा शाखा अध्यक्ष रमेश मेहता, महामंत्री कमलेश दुग्गड, कोषाध्यक्ष हेमंत चोपडा आदि मंचसीन थे। साथ ही युवा शाखा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेश मेहता ने स्वागत उद्बोधन देते हुए कार्यक्रम की भूमिका रखी।
अधिवेशन के प्रथम सत्र को सम्बोधित करते हुए मुख्य वक्ता साहित्यकार डॉ. दिलीप धीग ने कहा की हम जैन दिवाकर जी के नारे लगाते है मगर उनके साहित्य को कम पढ़ते है, दिवाकर जी के जीवन मे साहित्य के आयाम बहुत थे। उनकी परम्परा मे बहुत काम उनके नाम से हो रहे है मगर साहित्य के बारे मे इतना काम नहीं हो रहा। जैन दिवाकर जी ने जैन धर्म को बहुत सरलीकरण करके जन जन तक पहुंचाया है, जैन धर्म को साधारण आम जानो तक पहुंचाया है। शाकाहार, पर्यावरण आदि को भी बढ़ाया। आपने 133 रियासतो को उद्बोधन देकर शाकाहार से जोड़ा, धर्म का सामाजिक करणकर लोकव्यापी करण किया। हम दुसरो को नहीं अपनाते मगर जैन दिवाकर जी ने सभी 36 कोमो को अपनाया। लोक जीवन मे उन्होंने अपना प्रभाव छोड़ा, हमें आज संत समुदाय और वैरागीयों की पढ़ाई के लिए हमें सुदृढ़ व्यवस्था करनी होंगी। आज प प्राकृत भाषा को राष्ट्र स्तर पर दर्जा मिला हुआ है, हमारे पास अपने गुरुओं का इतना साहित्य है मगर उनको हम संभाल नहीं पा रहे है। हमें अपने साहित्य पक्ष को मजबूत करना होगा, साथ ही हमें अपने बीच विद्वानों को भी तैयार करना होगा। आज ज्ञान की साधना बहुत मुश्किल है, ध्यान से व्यक्ति का मान होता है और ज्ञान से अपनी परम्परा आगे बढ़ती है। भारतीय संस्कृति मै जैन संतो का बहुत बड़ा योगदान है।
उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जी जैन ने अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए कहा की सबसे पहले अपने जीवन मै मै जैन हूँ यह भाव होना चाहिए, उसकी प्रतिष्ठा हमारे जीवन मे वर्षो से है, अभी कुछ कमी आई है, मगर उसको पूरा करना होगा। राजनीती मे हमें अपने धर्म का नाम ख़राब नहीं करना चाहिए, हम पहले जैन है हमें कर्म से जैन बनना होगा। अन्य समाजो मे परिवर्तन दिख रहा है मगर हमें अपनी चका चौध मे आगे बढ़ते जैन सिद्धांतो का पूरा ध्यान रख़ना है। अपना जीवन इस तरह का हो जिससे हमारी पहचान हो, समाज को दिशा नेतृत्व देता है और नेतृत्व ठीक होगा तो सब सुधरेंगे। हम आज बहुत भागो मे बटे हुए है आज देश मे हम आधा प्रतिशत जनसंख्या मे है मगर देश की अर्थ व्यवस्था मे हमारा योगदान 24 से 25 प्रतिशत है। हमारे सभी संप्रदायों को एक होना बहुत जरुरी है, हमें श्वेतांबर और दिगम्बर मे नहीं बाटना है।
संघठन समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. आई एम. सेठिया ने सम्बोधित करते हुए कहा की हमें एकता के अग्रदूत गुरुदेव जैन दिवाकर जी के नाम को सार्थक करना है। हम संघठन समिति को प्रांतीय स्तर, जिला स्तर और शहर स्तर तक विस्तार करना है। आज दिवाकर जी के नाम से इतने काम हो रहे है हमें उनको एक धारा मे लाने का पूरा प्रयास करेंगे। इसके साथ साथ परिवारों को जोड़ने का प्रयास करेंगे। दिवाकर सम्प्रदाय मे जिन्होंने पूज्य गुरुदेव के दर्शन किये उनका जैन दिवाकर रत्न सम्मान के नाम से समिति द्वारा अभिनंदन किया जावेगा। इस संगठन को बहुत मजबूती देना है ताकि एकता के अग्रदूत के नाम को सार्थक कर सके। हम हमारी बातो को सार्वजनिक न करते बंद कमरे मे पूज्य गुरु भगवंतो के सामने करेंगे तो हमारी मनभेद भी दूर होगा और हम एकता से आगे बढ़ेंगे। युवाओं को जाग्रत होना होगा, इस सम्मेलन की सफलता युवा शक्ति का परिणाम है। हम वेबसाइट के माध्यम से जैन दिवाकर जी के उपदेशों और संदेशों को आम जन तक पहुचाने का पूरा प्रयास करेंगे। कार्यक्रम मे चेन्नई से आए युवा प्रणत धीग ने देव तुल्य माता पिता के ऊपर अपने पिता द्वारा लिखी कविता का पाठ किया।
राष्ट्रीय संगठन महामंत्री सिद्धराज संघवी ने सम्बोधित करते हुए कहा की जैन दिवाकर जी वाणी के जादूगर, जगत वल्ल्भ, एकता के सूत्रधार थे। आपने बड़े ही निडर और निर्भीकता से राजा से लेकर रंक तक को उपदेश दिए, हम सौभाग्यशाली है ऐसे गुरु को पाकर। संगठन समिति का निर्माण आपके आदर्श और उद्देश्य को अनत काल तक जीवित रखने के लिए किया गया था। जब से यह संस्था तब से कई कार्य योजना को समिति ने मूर्त रूप दिया। आज वर्तमान मे डॉ.आई एम सेठिया के नेतृत्व में संगठन शक्ति की वजह से हम आगे बढ़ रहे है, आपकी सोच की वजह से युवा शक्ति को आगे लाते हुए संगठन समिति ने युवा शाखा के माध्यम से प्रथम राष्ट्रीय युवा अधिवेशन को मूर्त रूप दिया।
संघ गौरव महेन्द्र बोथरा ने सम्बोधित करते हुए कहा की हमें संघटन समिति मै ताकत को पैदा करना होगा ताकि हम कुछ बोले तो पीछे की पंक्ति तक इसका पालन करा सके। हमें सामर्थ के साथ साधु संतो की सेवा करना है, अगर युवा साथी हमारे साथ रहेंगे तो हम हर काम को सिद्ध कर सकते है, पद तो आते जाते है मगर हम सबके सहयोग से समन्वय से काम करना होगा। आज हमारे मै कोई विघटन नहीं है, हम सब एकता के साथ सभी को एक मंच पर लाने का पूरा प्रयास करेंगे।
कार्यक्रम को संघ रत्न इन्दर मल जैन वकील साहब, रमेश भंडारी, सुनील बम, डॉ.सुधीर जी जैन ने भी सम्बोधित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रवीण दक ने एवं आभार हेमंत चोपडा ने माना।

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