“आत्मज्ञान ही सच्चा धन, बाहरी संपत्ति केवल भ्रम”

चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में मुनि श्री निर्णय सागर जी का प्रवचन — आत्मा और शरीर के भेद को समझने का दिया संदेश

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रतलाम । चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री निर्णय सागर जी ने कहा कि मनुष्य आज जिस धन के पीछे भाग रहा है, वह वास्तविक नहीं है। सच्चा धन आत्मा का ज्ञान है, जिसे समझे बिना जीवन का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
मुनि श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि समाज में धन की परिभाषा पूरी तरह बदल गई है। लोग रुपये, सोना-चांदी, जमीन-जायदाद और पशुधन को ही समृद्धि मान बैठे हैं, जबकि यह सब नश्वर और अस्थायी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गाय, भैंस, हाथी, घोड़ा या सोना-चांदी जैसे साधन केवल उपयोग की वस्तुएं हैं, न कि वास्तविक धन। इन पर आधारित जीवन अंततः असंतोष और मोह को बढ़ाता है।

आत्मा को जानना ही जीवन का उद्देश्य
प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया—“मैं कौन हूँ?”
उन्होंने कहा कि मनुष्य शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेता है और उसके आधार पर अपनी पहचान बनाता है। जबकि शरीर परिवर्तनशील है, आत्मा शाश्वत है। उन्होंने बताया कि आत्मा का मूल स्वभाव जानना और देखना है। जब तक मनुष्य इस सत्य को नहीं समझता, तब तक वह अज्ञान में भटकता रहता है।

न के भ्रम पर उदाहरण
मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी को नकली सोना असली बताकर बेच दिया जाए, तो वह धोखा खा जाता है।
ठीक इसी प्रकार, संसार में जो बाहरी धन दिखाई देता है, वह भी एक प्रकार का भ्रम है, जिसे मनुष्य वास्तविक मान बैठता है।

जन्म-मरण के चक्र का कारण
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर मानता है, वह बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है।लेकिन जो आत्मा के शुद्ध स्वरूप को जान लेता है, वह मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।

“जो शुद्ध आत्मा को जानता है, वही शुद्धता को प्राप्त करता है।”
“धन वह नहीं जो बाहर दिखाई देता है, धन वह है जो भीतर जागता है।”आत्मा शाश्वत है, शरीर नश्वर
बाहरी संपत्ति अस्थायी हैआत्मज्ञान ही वास्तविक समृद्धिअज्ञान जन्म-मरण का कारण है।

प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं समझता, तब तक सच्ची शांति और मुक्ति संभव नहीं है।

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