जिन्होने, सेवा ,तप व गुरुभक्ति को ही अपने संयमी जीवन का लक्ष बनाया ऐसे संघ सेवा विभूति श्रमण संघीय महामंत्री तपस्वीराज श्री मोहन मुनि जी महाराज ( काले डन्डे वाले) के पावन पुण्य स्मृति दिवस 27 मई पर कोटिशः वंदन
- संक्षिप्त जीवन वृत
- प्रस्तुति : भंवरलाल बाफना (लेखक पत्रकार)बामनिया रतलाम
- 19 वी पावन स्मृति दिवस पर विशेष

बहुत कम लोग यह जानते है कि तपस्वी राज श्री मोहन लाल जी म.सा की जन्म तिथी कब हे । क्यों कि वह अपना जन्म दिवस मनाना ही नही चाहते । मेने 13 वर्ष की आयु में पूज्य गुरुदेव श्री मोहन मुनि म.सा.गुरु आमना ली थी । संवत 2026 में आपका बामनिया में वर्षावर्ष था तब मे उनके सानिध्य में रहा तो मेने उनकी जन्म तिथी व वर्ष के बारे में पूंछा, और कहा कि आपका जन्म दिवस मनाए इसलिए पूंछ रहा हूं। उनका जो उत्तर था वह सुनकर ह्रदय भर जाता हे उन्होंने कहा कि मेरे गुरु की जयन्ती धूमधाम से मने यही मेरे लिए मेरा जन्म मनाना हे।
उनके जीवन संबधी जानकारी के लिए जब कुछ गुरुदेव अजित मुनि से चर्चा की और अवं कहा की में एक लेख लिख रहा हु उसके लिए चाहिए तो उन्होंने जो जानकारी दी वह लिख रहा हु भी
संक्षिप्त जीवन परिचय
आपका जन्म मेवाड़ के शाहपुरा कस्बे मे माता गुलाबबाई की कुक्षी से सेठ मांगीलाल जी पारख के यंहा संवत 1980 के मगसर बुदी पंचमी मंगलवार तदानुसार 16 दिसम्बर 1924 को हुआ । 20 वर्ष की योवन अवस्था में संवत 2000 की आषाढ शुक्ला सप्तमी को आपने महामन्दिर जोधपुर में श्रमण श्रेष्ठ मुनि श्री हजारीमल जी म.सा जो कि पूज्य जयमल जी म.सा की परम्परा के सन्त थे उनसे दीक्षा ग्रहण की । स्वामी ब्रजलाल जी म.सा., स्व युवाचार्य श्री मधुकर मिश्री लालजी म.सा आपके काका गुरु थे श्री मांगी लाल जी म.सा आपके गुरु भ्राता थे! आपके भ्राता स्व. अमोलक चंद जी म., स्व सोहन मुनि म. एवम घेवर चंद जी हे ।
दीक्षा के बादमें मोहन मुनि जी
जैन दिवाकर गुरुदेव श्री चौथमल जी म.सा की बहुमुखी प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि वो उनके पास आगये ओर हर समय गुरुदेव की सेवामें रहने लगे और गुरु शिष्य का एसा रिश्ता बन गया कि गुरुदेव भी उन्हे अपना शिष्य समजते व तपस्वी महाराज भी जैन दिवाकर जी महाराज को गुरुदेव मानते थे । यंहा तक कि पूज्य गुरुदेव अहरी चौथमल जी म.सा. वृद्वावस्था में जो लकड़ी ( काला डन्डा) चलने फिरने में साथ रखते थे वो भी तपस्वी को देदीया जिससे मोहन मुनि जी काले डण्डे के नाम से प्रसिद्द हो गये। तपस्वी मोहन मुनि जी के प्रमुख शिष्यो में उप प्रवर्तक श्री प्रदीप मुनि जी एवम सफल वक्ता श्री अजीत मुनि जी थे! दोनो का देवलोक गमन हो गया ।
2026 का चातुर्मास आपने मालवा क्षेत्र के बामनिया (नगर)में किया और वहा आपने अपने पूर्ण प्रभाव से धर्म की विमल मंदाकिनी बहाई जिसमे हजारो जैन जैनेतर भक्तो ने आनन्द पूर्वक अवगाहन किया । चारो महीनो में प्रार्थना स्वाध्याय और तप की विविध आराधनाये हुई ।भाद्रपद शुक्ल 7 को तेतीस उपवास की पूर्ति के उपलक्ष में भव्य कार्यकरण आयोजित हुआ जिसमे हजारो की संख्या में भक्त जानो ने भाग लिया !इसी प्रकार कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को जैन दिवाकर जी म.सा.की 92 वी जयंती तथा ज्योतिर्विद वयोवृद्ध स्थविर श्री कस्तूरचंद जी म.की 65 वी दीक्षा जयंती भव्य समारोह के साथ मनाई गयी !श्री दिवाकर जयंती के पुनीत प्रसंग पर बाहर की 2000 जनता एकत्र हुई थी ।
रतलाम से करीब 500 श्रावक-श्राविका जयंती पर बामनिया गए थे
रतलाम संघ की ओर से त.श्री मोहन लाल जी म.सा.को रतलाम पधारने की आग्रह भरी विनती की गयी इस पर तपस्वी जी म.श्री ने फरमाया की स्व.जैन दिवाकर जी म.की पूण्य-तिथि के उपलक्ष में 501 तेले तप हो तो रतलाम आवे उपस्थित जन समुदाय ने कहा की पूरा प्रयास करेंगे और महाराज श्री ने मगसर सु.०९ रतलाम पधारने की विनती फरमाइए ।
सभी गुरु भक्तो की पहचान एवम ध्यान रखना
गुरुदेव के देवलोक गमन के बाद वे एसे सन्त थे जो म.प्र., राजस्थान व अन्य प्रान्तो के गुरुभक्तो से जीवीत सम्पर्क था ओर उनके बारे में पूरी जानकारी रखते थे ! एसा कइ बार देखा गया कि कही मंगलीक सुनाने जाना हो तो वो दस – बारह कि.मी तक चले जाते थे ! किसी परिचित श्रावक के घर पर गमी की स्थिती होजाती तो उसका पुरा ध्यान रखना ये एसी विशेषता थी कि हर सन्त के पास नही हो सकती ।
संस्थाओं की प्रेरणा
मुनि श्री की प्रेरणा से कई संस्थाए प्रारम्भ हुई जिसमें श्री जैन दिवाकर हास्पीटल एण्ड रिसर्च सेन्टर सागोद रोड रतलाम
जैन दिवाकर होस्पीटल कोटा
जैन दिवाकर चिकित्सालय नीमच
धार्मिक स्थानो में
जैन दिवाकर सामाइक साधना भवन रतलाम कोठी इन्दौर
जैन दिवाकर सामाइक भवन महावीर नगर इन्दौर
जैन दिवाकर स्मारक रतलाम
जैन दिवाकर ज्ञान खाता आदि कई संस्थाओ के लिए प्रेरणा दी ! हमेशा उनके आराध्य गुरुदेव जैन दिवाकर जी महाराज के नामसे ही संस्थाए प्रारम्भ करवाइ ! अपने नाम का कइ उल्लेख नही किया यह उनकी गुरुभक्ति की बड़ी मिसाल हे !
श्रमण संघीय महामंत्री
पहले आप श्रमण संघ के सलाहकार थे सन 2003 मे आचार्य डा. शिव मुनिजी म.सा. ने श्रमण संघ का महामंत्री नियुक्त किया।
सेवा की मिसाल
उन्होने अपने जीवन काल में श्रमण संघ के चारो आचार्यो की सेवा की प्रथम आचार्य श्री आत्मा राम जी म.सा जब लुधियाना मे स्थिरवास थे तब आचार्य श्री मोहन मुनि जी की सेवासे इतने अभिभूत हुए कि जब रतलाम में सन 1984 के संजय मुनि के तपोत्सव पर रतलाम में श्री हीरालाल जी जैन जो लुधियाना के रहने वाले थे वो उस समय कांफ्रेस के युवा अध्यक्ष थे आए थे उस समय उपाध्याय कस्तुर चंद जी म.सा के सामने यह कहा कि हम इन की सेवा से अभिभूत है कि इनको याने तपस्वी मोहन मुनि को अपना गुरु बनाया । उस समय तपस्वी श्री मोहन मुनि जी भी वहा विराज मान थे। मे स्वयम प्रत्यक्ष दर्शी था। आचार्य सम्राट आनन्द ऋषी जी म.सा. की कइ बार सेवा में रहे । अजमेर साधु सम्मेलन में भी बहुत सेवा करी ।
आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी का जब चादर महोत्सव होने वाला था । उनके गुरुदेव श्री पुष्कर मुनि जी गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे ! पुरी सेवा की जवाब दारी अपने पर ली व विशाल कार्यक्रम उदयपुर में सम्पन्न हुआा । पांच दिन बाद पुष्कर मुनि जी का महाप्रयाण होगया ! आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी ने जब भी सेवा की बात आइ तपस्वी मोहन मुनि की बात कही । जब चादर महोत्सव उदयपुर में 28 मार्च 93 को होने वाला था, आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी अपने गुरुजी के स्वास्थ के बारे में चिन्तित थे, तपस्वी जी ने कहा आप चिन्ता मत करो , आपका चादर महोत्सव आनन्द से सम्पन्न होगा, गुरु जी की सेवा मे में हू और हुआ भी वही । कार्यक्रम बहुत उत्साह से सम्पन्न हुआ व तीन अप्रेल को उनका देवलोक गमन हुआ।
आचार्य शिव मुनि जी भी उन्हे संघ सेवा विभूति मानते हैं । पंजाब से आने के बाद मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र विचरण में इन्दोर से पूणे सम्मेलन तक उनकी सेवा अनुपम थी! इसके अतिरिक्त उन्होने कई महापुरुषो की सेवा की उसका विवरण फिर किसी प्रसंग पर करूगां।
महाप्रयाण
धुन के धुनी तपस्वी जी के हृदय में जम गई की श्रमण संघ में पुनः एकता आवश्यक हे वह जो सन 2003 में श्रमण संघ में बिखराव की स्थिती हो गइ थी तथा उनका मन इस से आहत था अतः श्रमण संघ पुनः एक हो इस उद्येश्य से रतलाम में श्रावको के इंकार करने के बाद भी वृद्धावस्था में अकेले ही दिल्ली में आचार्य श्री शिव मुनि जी से मिलने के लिए निकल गये !
काल किसी के हाथ में नही
27 मइ 2007 की प्रातः की बेला एसी आइ कि दुदु के पास से विहार करते हुए एक दुर्घटना में देवलोक गमन हो गया । एक महान सेवाभावी संत हमसे हमेशा के लिए अलग हो गये ।
उस समय महासती श्री कुमुद लताजी आदि महासती मंडल वंही पास मे बिराज रहे थे उनको मालूम पड़ी वह वंहा पंहुचे व अखिल भारतीय जैन दिवाकर संगठन समिती के अध्यक्ष श्री लक्षमी चंद जी सा तालेड़ा को समाचार किये गये ! वो तत्काल वंहा पंहूचे । सभी संघो को सुचना दी गई ।
रतलाम में दाह संस्कार
रतलाम के गुरुभक्तो का अत्यधिक आग्रह था कि दाह संस्कार रतलाम मे ही हो उनके पार्थिव शरीर को दुदु से रतलाम लाया गया जो देर रात रतलाम पहुंचा एवम प्रातः अन्तिम यात्रा प्रारंभ हुई हजारो की जन मेदिनी के साथ यात्रा जैन दिवाकर स्मारक सागोद रोड पंहूची एवम अन्तिम संस्कार हुआ।
जैसे भगवान राम के हनुमान वैसे जैन दिवाकर के मुनि मोहन
उनकी गुरुभक्ति राम व हनुमान की जोड़ी के रूप में जानी जाती हे। एसे तपस्वी जिन्होंने वर्षो तक एकान्तर तप किया बैले बेले पारणे किये, कितने ही समय तक अन्न का त्याग किया । वह कहते थे कि में संस्थाओ के लिए प्रेरणा देता हूं तो मुजे दोष लगता हे इस हेतु वह विगय छोड़ देते । एसी कइ तपस्याएं निरन्तर चलती रहती । मुझे उनका बहुत बार सानिध्य प्राप्त हुआ व उनका स्नेह व आशीर्वाद रहा जो कभी भुलाया नही जासकता आप जंहा भी हो कृपा बरसती रहे ।
गुरुदेव के चरणों में अनेकानेक वंदन
भंवर लाल बाफना
वरिष्ठ मार्गदर्शक अ.भा.जैन दिवाकर संगठन समिति
संरक्षक मारुती नंदन गौशला बामनिया
पूर्व सचिव वर्धमान स्थानक वासी जैन श्रावक संघ बामनिया
पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान मार्गदर्शक सोनाना खेतला जी भेरू जी ट्रस्ट बामनिया